06/09/2019

मुझे तुम छोड़ दोगी ये पता है



कभी कविता कभी हथियार जानाँ
हमीं से प्यार हमपे वार जानाँ

मुझे तुम छोड़ दोगी ये पता है
भले ही दिन लगें दो - चार जानाँ

खबर भी क्या पढ़ें आबो हवा की
बहुत झूठे लगें अखबार जानाँ

कही! क्या लिख रहे हो आजकल तुम ?
बहुत चुभते हैं ये अश्आर जानाँ

मुझे तुम छोड़ कर जब से गई हो
नहीं देखा कोई दरबार जानाँ

फ़कत खामोश लफ़्जों की बयानी
नहीं कुछ और मेरा प्यार जानाँ

बदलते लोग हैं हर रोज ऐसे
बदलती हो यहाँ सरकार जानाँ

नीलेन्द्र शुक्ल " नील "

तू क्यों बाहर रहती है



साहब सुन लो अर्जी है
कुछ मेरी भी मर्जी है

खून, पसीना बेंचे हो
तब आई खुदगर्जी है

हाँ मेरे हालात ओ ग़म
तेरी खातिर फर्जी हैं

कपड़े में इतने रफ्फू
मुझसे अच्छे दर्जी हैं

सोचा था कुछ अच्छे हैं
सबके सब बेदर्दी हैं

तंगी घर है सालों से
सालों से माँ भर्ती है

छोटी निकली बेहूदी
जो मन आये करती है

अब तो मुझमें जीना सीख
अब्भी मुझपे मरती है

घर में दीप जलाएगी
बिटिया बाहर पढ़ती है

तेरे घर के बाहर हूँ
तू आने से डरती है

"नील" तुम्हारे अन्दर है
तू क्यों बाहर रहती है

नीलेन्द्र शुक्ल " नील "

31/08/2019

अनाज हूँ मैं

Pic Credit - Axita Joshi

तुम्हारे चेहरे की रौशनी हूँ, तुम्हारी आँखों का ख़ाब हूँ मैं, अनाज हूँ मैं
हमारी भी है हसीन दुनिया उसी का इक आफताब हूँ मैं, अनाज हूँ मैं

नहीं हूँ पहला, न आखिरी हूँ, तुम्हारी साँसों के बाद हूँ मैं, अनाज हूँ मैं
निहाल होता हूँ रोज सब पे, सभी का पहला इलाज़ हूँ मैं, अनाज हूँ मैं

मुझे बचाओ, रखो हमेशा, नहीं बहाओ, हिसाब हूँ, मैं अनाज हूँ मैं,
मुझे किसानों से पूछना तुम, उन्हीं के जीवन का राग हूँ मैं, अनाज हूँ मैं

तुम्हारा कल था, तुम्हारा कल हूँ मुझे समझ लो जो आज हूँ मैं, अनाज हूँ मैं
सदा महकता हूँ थालियों में तुम्हारे दिल का नवाब हूँ मैं, अनाज हूँ मैं

रगों रगों में जो बह रहा है वो खून मैं हूँ, जवाब हूँ मैं, अनाज हूँ मैं
हर एक घर का, हर एक होटल, हर एक महलों का नाज़ हूँ मैं, अनाज हूँ मैं

हर एक मुल्कों की आँख की मुझपर, युँ देखते हैं के खास हूँ मैं, अनाज हूँ मैं
फुलाए फिरते हो छातियाँ तुम, तेरे बदन का शबाब हूँ मैं, अनाज हूँ मैं

30/08/2019

कहो! कहने लगे तो क्या करोगे



हमेशा मुँह छुपा भागा करोगे 
बड़ा कब से कहो जज्बा करोगे

अभी ये हाल है जब सीखता हूँ 
कहो! कहने लगे तो क्या करोगे

सिखाओगे नहीं बच्चों को कुछ भी, 
तो फिर क्या ख़ाक तुम आशा करोगे 

निभाना जिन्दगी भर साथ उनका 
नहीं तो खाँ - म - खाँ तन्हा करोगे

शिकायत है बड़े लोगों से मेरी 
बड़ा मुझको भला तुम कब करोगे

लड़ो मुझसे उन्हें क्यों छेड़ते हो 
मेरे लोगों से भी नफरत करोगे

26/08/2019

मैं मरा मुझसे, मुझे मारा कोई शैताँ नही


इस तरफ से ना नहीं पर उस तरफ से हाँ नहीं 
और मैं मरता नहीं क्यूँ ये निकलती जाँ नहीं 

दर्द को बस दर्द दो ये दर्द ही मर जाएगा 
मैं मरा मुझसे, मुझे मारा कोई शैताँ नही 

हाँ मेरे जन्नत के दरवाजे की तुम हो रहगुज़र 
पर हकीकत जो कहें हम दो बदन इक जाँ नहीं 

लो लुटा लो प्यार मुझपर खूब ही बोसे मगर 
जो मिला पहली दफा वैसा कोई बोसा नहीं 

तू बहुत नाजुक है मेरे यार तू बाहर न आ 
दिल बहुत नादान है तू ये शहर नादाँ नहीं  

और तू कहता है वो हिन्दू जनी मुस्लिम जनी 
माएँ इंसा ही जनी हिन्दू नहीं मौला नहीं 

एक माँ से हैं नहीं रिश्ते में हैं भाई - बहन 
इस तरह रिश्ते निभाना भी यहाँ आसाँ नहीं 

जिन्दगी के पेचो - खम  में ही बहुत उलझे रहे
जो उठाया हूँ कलम गज़लें लिखी उन्वाँ नहीं 

कूच कर ले ऐ फकीरे! इस नगर से आज ही 
भूख से मर जाएगा इतना शहर अच्छा नहीं

भीगता ही रह गया मै रात - दिन बादल तले 
बह गये सारे शहर अब तक बहे अरमाँ नहीं 

बाँध लो घुँघरू, सजाओ महफिलें, रश्के कमर 
और मैं पीता रहूँ जब तक बुझे शम्माँ नहीं 

बस हसीनाओं की ज़ुल्फ़ों को संवारें रात - दिन 
सोचना फिर सोचना ऐसा ये हिन्दोस्ताँ नहीं 

पैरहन क्या देखता है? देखना है मन को देख



ये भरी कश्ती, भरा सावन, भरे मौसम तू देख
पैरहन क्या देखता है? देखना है मन को देख

फ़ुरकत - ए - गम में बहुत मशगूल हूँ मैं रात - दिन
तू कहीं भी देख पर मेरा दिल - ओ - आँगन तो देख

आ गया बनकर भिखारी आज तेरे द्वार पर
भीख़ देने के बहाने आ इसी कारण तो देख

हिज्र ने हैवान से इंसा बना डाला मुझे
ख़्वाब में जीना सिखाया भर गया दामन तो देख

बेटियाँ इक्कीस की हैं और पेशा कुछ नही
मुश्किलों के दौर को जीता हुआ आदम तो देख

ईद की ईदी हुई है रौशनी को देखकर
बेखबर सौहर चमकते चाँद सा साजन तो देख

दिल के छालों को निकाला रख दिया बाज़ार में
वाहवाही से भरा ज़ालिम ये वो आलम तो देख

शबनमीं शामें, धड़कते दिल, हँसी चेहरों के बीच
ये बदलते मौसमों के मौसमी बालम तू देख

देखने को जा रहा था मैं हंसी दरिया मगर
एक यायावर पुकारा " नील " ये मातम तो देख


12/08/2019

पन्द्रह अगस्त



पन्द्रह अगस्त, पन्द्रह अगस्त, पन्द्रह अगस्त, पन्द्रह अगस्त
कहने को देश कृषक का है, दिखते हैं सारे कृषक त्रस्त ।

खेतों को आँसू से सीचूँ या कहो लहू से भर दूँ मैं
या आग लगाऊँ वृन्तों में, विपिनों को भस्मित कर दूँ मैं
कितनी डी.ए.पी और यूरिया भाँति - भाँति की खादे हैं
मरने वाले उन कृषक भाइयों की कितनी सौगातें हैं

बचपन से देख रहा हूँ कृषकों का चेहरा दिखा पस्त ।

घर से निकले सारे भाई औ' ज्यों ही पहुँचे सीमा पर
तड़तड़ - तड़तड़ गोलियाँ चली निकला है लहू पसीना पर
अन्तिम साँसों तक लड़े वीर सैनिक बस रक्षा की ख़ातिर
अक्सर कुर्बानी देते हैं अपनी भारत माँ की ख़ातिर

वो लोग अभी न घर पहुँचे सूरज देखो हो गया अस्त ।

जो पाँच साल की बच्ची से हो रहा है दुर्व्यवहार यहाँ
ये लोकतंत्र लेकर ढ़ोऊँ ? क्या देखूँ मैं संस्कार यहाँ?
हाँ बलात्कार पे बलात्कार होते रहते हैं आये दिन
कर देंगे भ्रूण - मृत्यु लेकिन जीना चाहेंगे बिटिया बिन

बच्चियाँ मौत के घाट हुई, हैं बहन, बेटियाँ पड़ी लस्त ।

कम्प्लेन हुई थी पहले दिन अब तक अपराधी मिला नहीं
बस इसी बात का दुःख मुझे उनको कोई भी गिला नहीं
खा लिये पान करते पिच् - पिच् चौराहों पर गाली बकते
झूठे चालान बनाते हैं ऊपरी खर्च अन्दर रखते

खा खाकर सरकारी पैसा है पुलिस यहाँ की मटरगस्त ।

जो रीत जहाँ की है यारों वो रीत चली ही आएगी
सबका है सबसे प्रेम यहाँ तो प्रीत चली ही आएगी
रह गया स्तब्ध जब भी आया देखा करके मैं आँख बन्द
इस भारतीय सम्बन्धों में दिखता मुझको ऐसा प्रबन्ध

सदियों से पड़ती आई है अब भी फाइल पे पड़ी डस्ट ।

मैं नमन करूँगा उन सबको जो हैं इसपर बलिदान दिये
नेता, मंत्री, सैनिक, जन हों जो भी इसका सम्मान किये
पर उन्हें कभी न छोड़ूँगा जिनके हैं पेट बड़े भारी
है मिलीभगत इन लोगों में खाते रहते पारापारी

ये लोकतांत्रिक - देश यहाँ नेता, मंत्री हैं सदा मस्त ।


08/08/2019

ये हिन्दू - मुस्लिम के बच्चे एक नहीं हो पाएँगे


कविताएँ लिख - लिख मर जाओ नेक नहीं हो पाएँगे 
ये हिन्दू - मुस्लिम के बच्चे एक नहीं हो पाएँगे 

संस्कारों की चादर तानों वादों के फरमान गढ़ो
ईश्वर - अल्लाह रोज मनाओ गीता और कुरान पढ़ो
कितना भी कुछ कर ले यारा! देख, नहीं हो पाएँगे 

पुनर्नवा करते करते ही अभिज्ञान हो जाएगा 
दोनों में फिर युद्ध छिड़ेगा सब श्मशान हो जाएगा 
रक्ताप्लावित होगा कुछ अवशेष नहीं हो पाएँगे 

संविधान कठपुतली होगा शोकगीत बन जाएगा 
हम हिन्दू हैं, हम मुस्लिम हैं यही महज़ हो पाएगा 
इसी देश में ईद और अभिषेक नहीं हो पाएँगे 

मुखिया हैं दोनों पक्षों में दोनों का खूँ खौल रहा 
धरती भी कम्पन करती है काल आग जब बोल रहा 
एक म्यान में दो तलवारें फेंक, नहीं हो पाएँगे 

04/08/2019

" नील " जगत अपनी गति चलता है छोंडों भी जाने दो


वो चुपचाप देखती मुझको मैं करता था नादानी 
उसके भीतर खामोशी थी मेरे अन्दर शैतानी 

हम सबके होते हैं सब मुझमें आकर बसते हैं क्या? 
कुछ रिश्ते दिल के होते हैं कुछ होते हैं बेमानी 

अब तक जितना भी देखा हूँ ये धरती, ये आँगन मैं 
चमकी आँखें,  देखी फसलें रंगों में धानी - धानी 

सन्तों का चोला है बाकी मन की बातें जानो तो 
ढोंग दिखावा संन्यासी का भीतर - भीतर अज्ञानी

अब बच्चों को फुर्सत कब है पढ़ने और पढ़ाने से 
कैसे वो बातें जानेंगें जिनमें हैं राजा - रानी 

कैसी दशा हुई है ? कैसा हाल हमारे भारत का ?
आँखों से आँसू रिसता है चेहरे प है हैरानी 

" नील " जगत अपनी गति चलता है छोंडों भी जाने दो 
गालिब रोये, तुलसी रोये, कौन सुना कबिरा - बानी 

29/07/2019

गिरी है "नील" वो शबनम कहीं पर


युँ ही लगता नहीं है मन कहीं पर 
दिखें जब तक नहीं हमदम कहीं पर

है भीतर शोर,  ख़ामोशी है बाहर 
हुआ कैसा ये स्पन्दन कहीं पर 

दरिन्दे देश में बढ़ने लगे हैं  
बचाती बेटियाँ दामन कहीं पर 

दिखे दोनों नहीं इक साथ मुझको 
कहीं विद्या दिखी तो धन कहीं पर 

चढ़ी है मुफलिसी सर पर हमारे 
लगे अच्छा नहीं मौसम कहीं पर

कभी दिखते नहीं ख़ालिक बनें हैं 
बढ़े हैं खूब अब रावण कहीं पर 

सुबह से रो रहा मासूम बच्चा 
कहीं सूना पड़ा आँगन कहीं पर 

बिरहमन फूटकर रोते मिले हैं 
मुझे ऐसा दिख़ा आलम कहीं पर 

अजब उलझन मची भीतर हमारे 
कहीं पर तन हमारा, मन कहीं पर 

जिसे हम रात-दिन सोचा किये हैं 
गिरी है "नील" वो शबनम कहीं पर 

21/07/2019

आखिर जब तुम ही न होगे कैसा होगा ये जीवन



आखिर जब तुम ही न होगे कैसा होगा ये जीवन 
ना तुम होगी, ना हम होंगे, ना होंगे ये घर - आँगन ।।

क्या होंगे प्रासाद भवन सब तेरे आगे फीके हैं 
तुझको, तुझसे ज्यादा चाहें बस इतना ही सीखे हैं 
कितने बादल घेरे - घुमड़े तुम पर असर नहीं होता 
बरषा जैसी बरसी मुझपर मुझ बिन बसर नहीं होता 

ऐसे पल - पल बीत रहे हैं तुम बिन तड़पेगे सावन ।

उन अधरों पर गजल , गीत आखिर कैसे लिख पाऊँगा 
दूर रहोगे मुझसे ही गर कैसे साथ निभाऊँगा 
तुम ही बोलो मधुर - मिलन उन बातों का फिर क्या होगा 
तुम ही बोलो अन्तहीन उन रातों का फिर क्या होगा 

सब श्रृंगार उतर जाएँगें टूट चुका होगा दर्पण ।

शब्दों की माला पहनाऊँ भावों से श्रृंगार करूँ 
तुमसे पहले महक तुम्हारी आये इतना प्यार करूँ 
कोरा - जीवन हो जाएगा औरों में बंट जाएगा 
यद्यपि इन अवसादों में भी ये जीवन कट जाएगा

महज़ वेदनाएँ भर होंगी और रहेगा पागलपन ।

जहाँ - जहाँ हम बाग - बगीचों में जा बैठा करते थे 
कलरव करते आते पंक्षी विषय अनूठा करते थे 
सारे भाव उपस्थित होते आलम्बन , उद्दीपन के 
और जवानी के पर लग जाते थे उस पल सावन के 

कोयल जब भी कूँक उठाएँगी मन में होगी उलझन ।

आखिर जब तुम ही न होगे कैसा होगा ये जीवन 
ना तुम होगी, ना हम होंगे, ना होंगे ये घर - आँगन ।।

रात की काली चदरिया ओढ़कर हम चल दिये


रात की काली चदरिया ओढ़कर हम चल दिये 
मेरी दुनिया, मेरे मञ्जर, मेरे अपने हल दिये 

कुछ घड़ी, कुछ पल बिता सकता था मैं भी साथ पर 
जिस वख़त प्यासा रहा मैं उस वख़त न जल दिये 

और अब किससे गिले - शिकवे करूँ मैं उम्रभर 
वो डुबाए बीच में बोलो कहाँ साहिल दिये 

जिनसे आशाएँ बहुत थी, थे बहुत सपने सजे 
जिन्दगी दुश्वार करके वो मुझे दलदल दिये 

आँख मेरी अब खुली है जब तमाशा बन गया 
मेरे घर मुझको नही रखे, मुझे जंगल दिये 

जिनको मैं देखा नहीं जिनपे ये नज़रें न गई 
जिनको अपना मैं न समझा बस वही सम्बल दिये 

19/07/2019

उपनिषद के मंत्र जैसी है तुम्हारी भावना



उपनिषद के मंत्र जैसी है तुम्हारी भावना
तुम वहाँ पर थी जहाँ पर वेद की थी छाँव ना ।।

एक क्या चौसठ कलाओं में सदातन जो बही हो
आयतों में और तुम वैदिक ऋचाओं में रही हो
तुम महाकवि कालिदासी - काव्यों की नायिका सी
हो लता मंगेशकर जैसी अनूठी गायिका सी
हैं थिरकते पैर जैसे पार्वती का लास्य हो
और हँसनें की कला यूँ है लगे मधुमास हो

आज भी भाता तुम्हें अपना पुराना गाँव ना ।।

दर्शनों के गूढ भावों का अनोखा सार हो तुम
और भाषाओं का जीता जागता परिवार हो तुम
तुम नहीं अभिनेत्री पर क्या कहूँ अभिनीय हो
रूप, यौवन, ज्ञान, धन से सच अनिर्वचनीय हो
दूर कर अज्ञान तुम करती रही हो आवरण
ज्ञान देती हो, पढ़ाती प्यार का तुम व्याकरण

द्वैत को अद्वैत में बदला किया अलगाव ना ।।

14/07/2019

" नील " मेरे ख़याल लोगे क्या


रंग मुझसे गुलाल लोगे क्या 
आश़िकी की मिसाल लोगे क्या 

इश़्क है ज़ीन में मेरे भीतर 
इश़्क बोलो निकाल लोगे क्या 

भागती है तो भाग जाने दो 
अपने सर पे बवाल लोगे क्या 

रात - दिन इंतज़ार करते हो 
खुद को ऐसे सम्हाल लोगे क्या 

छोड़ दो या कि साथ ही ले लो 
फैसला, एक साल लोगे क्या 

रोज इज्जत से चाय देते थे 
आज ना हालचाल लोगे क्या 

छोड़ दो बन्द भी करो ड्रामा 
न्याय में अब दलाल लोगे क्या 

और नजदीकियाँ बढ़ाते हो 
" नील " मेरे ख़याल लोगे क्या 

@नीलेन्द्र शुक्ल " नील "
#Poetrywithneel

26/06/2019

कंकर शंकर कर गुज़रा हूं



बाहर भीतर से गुज़रा हूं 
मैं तेरे घर से गुज़रा हूं

तू गुजरी है मुझमें होकर
मैं तुझमें होकर गुजरा हूं 

मेरी बातें जुबां तुम्हारी 
डीदा ए तर से गुज़रा हूं 

आयात और ऋचाएं गूंजी
कंकर शंकर कर गुज़रा हूं

देख रहे हो जमीं जमीं पर
मैं अम्बर अम्बर गुजरा हूं 

होंठ लिपटे हैं, नजर बंद, कमर हांथों में



तेरे शहर में, तेरे साथ मेरा प्यार चले
साथ तेरा रहे यूं मौसम ए बहार चले

जिन्दगी खुशनसीब जन्नत ए चमन जैसी 
तू जो आए तो मेरे सारे गम गुजार चले 

रूप है चांद सा, ख़ुशबू है रातरानी सी 
रात संग बैठकर अपनी ग़ज़ल संवार चले 

होंठ लिपटे हैं, नजर बंद, कमर हांथों में
खूबसूरत रहा लम्हा वो बार बार चले

लोग पढ़ते हैं, देखते हैं और सुनते हैं 
तुम्हारी रूह निकाले यहां उतार चले 

एक चलने से तेरे, ये जहां चलता है 
नील के साथ तुम चले तो बेशुमार चले 

खींचता होंठ का तुम्हारे तिल



तुम्हें मिला तिरी खबर जाना 
आज तुमको मैं बेखबर जाना 

दुआ में मांगते हैं लोग मुझे 
बात ये आज इस सहर जाना 

खींचता होंठ का तुम्हारे तिल
और सबकुछ है बेअसर जाना 

आई घर से वो सुर्ख आरिज़ में
दे दिया दांत का असर जाना 

एक इक गोद में तुम्हारे सर 
एक तुझमें मेरा बसर जाना 

और क्या कर दिया कहो, तुमको 
देखता नील दर ब दर जाना

तिरंगा बेटियां लहरा रही हैं


कहीं पर कोयलें कुछ गा रही हैं 
मधुर संगीत की धुन आ रही है 

निकलकर आज दरवाजों से बाहर 
तिरंगा बेटियां लहरा रही हैं 

तुम्हारे आंख की ख़ामोशियां सब 
हमारी आंख से बतला रही हैं 

खुली रंजिश में टकराता है भारत 
हमारे देश की दरियादिली है 

मुहब्बत सरफ़रोशी की तमन्ना 
मुहब्बत ही जमीं समझा रही है 

हृदय आकांक्षा से भर गया है 
बालाएं जो रही वो जा रही हैं

कहां से छू गई मुझको सरापा
हवा ये नील को बहका रही है 

चली आई मुझे शंकर बनाने



कभी ईश्वर कभी कंकर बनाने 
लगा घर सा कोई अन्दर बनाने 

सती के रूप में मेरी मुहब्बत
चली आई मुझे शंकर बनाने 

बहुत सी बात थी खामोशियों में
जुबां उसको लगी जर्जर बनाने 

चुनावी मसअला छाने लगा है 
लगे अब खुशनुमा मंज़र बनाने

अधूरी सांस भी थी टूटने को 
तभी वो आ गए रहबर बनाने 

मुहब्बत नील का पर्याय है सर 
इसे क्यों आ गए कमतर बनाने 

01/05/2019

मजदूरों को कब किसनें फुर्सत देखा


अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस की हार्दिक शुभकामनायें 😭-
ये इनको खुश करने की है चाल महज 
मजदूरों को कब किसनें फुर्सत देखा

रामराज कै रहा तिरस्कृत रावणराज भले है!

देसभक्त कै चोला पहिने विसधर नाग पले है रामराज कै रहा तिरस्कृत रावणराज भले है ।। मोदी - मोदी करें जनमभर कुछू नहीं कै पाइन बाति - बाति...