16/09/2016

'' जनसंख्या है , आबादी है ''

जनसंख्या है , आबादी है ,
लगता मुझको बर्बादी  है।

जिस देश में भूँखे लोग मरें ,
उस देश में क्या ? आजादी है।

जिस घर में चूल्हे जलें नहीं ,
उस घर बिटिया की शादी है।

घर जाते ही छपटा ले जो ,
वो मेरी बूढ़ी - दादी हैं।

प्रेमी हूँ मिलन करूँ कैसे ?
वो महलों की शहज़ादी हैं।

वो लोग मंच पे बैठे हैं ,
जो लोग पहनते खादी हैं।

भाषण देते वो माया पर ,
जिनका सिंहासन चांदी है।

उनसे मज़कूर भी क्या करना ?
जो केवल हिन्दूवादी हैं।

अंग्रेजी - सत्ता हिला दिए ,
वो वीर महात्मा गाँधी हैं।

उनसे हम आश लगाएं क्या ?
वो तो विदेश के आदी हैं।

ऐ '' नील '' नही वहशत कुछ भी ,
अब बातों की आजादी है।

' बच्चे हैं , उनको पलने दो '

बच्चे हैं , उनको पलने दो !

कब तक तुम कोख उजाड़ोगे ,
कब तक बच्चों को मरोगे !
जो साँचे में आ जाते हैं उनको तो अब तुम ढ़लने दो !!

कितने तो अभी अपाहिज़ हैं ,
वो बच्चे जो नाजायज़ हैं !
यदि बैशाखी पे चलते हैं तो शौक़ से उनको चलने दो !!

जिसको पाली हो प्रसव करो ,
न उसको अब तुम शव करो !
जो देख जलें मिथ्या बोलें उन लोगों को तुम जलने दो !!

जो हैं अनाथ न दुत्कारो ,
उनको संताप से न मारो !
यदि मचल गए हैं बालक सब तो खुलकर आज मचलने दो !!

बच्चों को हृदय लगाओ तुम ,
इक खुशी आप में तुम !
यह देख अगर सुलगे कोई तो उसको ज़रा सुलगने दो !!

07/09/2016

" वाहवाही नही चाहिए अब मुझे "

वाहवाही नही चाहिए अब मुझे ,
शहंशाही नही चाहिए अब मुझे

जो गरीबों के दुःख , दर्द समझे नही,
वो इलाही नही चाहिए अब मुझे

भूँख से ज़िंदगी सब तड़पती रहें ,
वो तबाही नही चाहिए अब मुझे

छोड़कर राह में भाग जाते हैं जो ,
व्यर्थ - राही नही चाहिए अब मुझे

ज़ुल्म जो भी करे अब सज़ा दो उसे ,
बेगुनाही नही चाहिए अब मुझे

हाँथ रखकर के गीता पे मिथ्या कहे ,
वो गवाही नही चाहिए अब मुझे

खून खौले न जिनका बलात्कारों पे ,
वो सिपाही नही चाहिए अब मुझे

जुल्म सहकर सदा शान्त बैठी रहे ,
वो सियाही नही चाहिए अब मुझे 

" अपने कौन हैं ? सभी पराए ।। "

अपने कौन हैं ? सभी पराए ।।

जब तक खुद का अर्थ नही है ,
सत्य है मिथ्या , व्यर्थ नही है ।
तब तक ये दुनिया ठुकराए ।।

रोया हूँ , प्रायः अपनों से ,
टूटा हूँ, बिखरे सपनों से ।
गैरों से क्या आश लगाएँ ?

ईश्वर शान से जीना चाहूँ ,
न अपमान मैं पीना चाहूँ ।
मुझसे ही क्यों द्वेष जताए ?

03/09/2016

" तुम्हारे ख्याल में "

जिन्हें सपनों में न भुला पाए ,
उन्हें आखिर मैं भुलाऊँ कैसे ?
उनके इस बेवफाई के किस्से ,
भरी महफिल में सुनाऊँ कैसे ?

रहनुए बहुत आए ,गए और फरार हुए ,
जली बाती से ये दीपक मैं जलाऊँ कैसे ?
वैसे तो इधर भी कमी नहीं है कलियों की ,
फिर भी रेत में मैं फूल खिलाऊँ कैसे ?

बरसों के जख्म तन के भर रहे शायद ,
डाल अंगार उन्हें जख़्म बनाऊँ कैसे ?
कभी कविता, कभी गज़लें, कभी इन मिश्रों से ,
हूँ उनका नाम लिया, वरना बुलाऊँ कैसे ?

तेरी नादानी ने इस कदर कहर ढाया है ,
रात की नींद उड़ी सोऊँ, सुलाऊँ कैसे ?
तूने बीती हुई यादों का बोझ जो डाला,
तुम्ही बताओ इसका भार उठाऊँ कैसे ?

तेरी फिकर में कभी सहर, कभी शाम हुई ,
मैंने सोचा कि पूरी रात बिताऊँ कैसे ?
रात छोटी पड़ी भावों में तेरे मस्त रहा ,
तेरी पलकें न झुकी ,आँख हटाऊँ कैसे ?

सामने आता रहा भोला, फरेबी चेहरा,
तेरे चेहरे के मुखौटे को हटाऊँ कैसे ?
सोंचता हूँ  के आज रात यहाँ पार करूँ,
पर तुम्हें छोड़ अकेले यहाँ जाऊँ कैसे ?

तेरा मक़सूद है शायद मुझे गिराने का ,
अम्दन पैर पे मैं वज्र चलाऊँ कैसे ?
जब दिल टूट कर बिखर गया श्मशान हुआ,
अब मैं प्यार, मुहब्बत को जताऊँ कैसे ?

क़यास आता रहा मित्र बना लूँ उनको ,
टूटे पत्ते को मैं टहनी से मिलाऊँ कैसे ?
उनकी फ़ितरत है कि वो एक पे नही टिकते ,
सागर में नाव मैं उतार, चलाऊँ कैसे ?

आज महबूब संग खिले - खिले नज़र आए ,
कितने महबूब हैं उनके ये बताऊँ कैसे ?
प्यार की अर्थियाँ कितनों की उठा दी उसने,
उनके इल्ज़ाम यूँ उँगली पे गिनाऊँ कैसे ?

कभी जो मेरे खुदा, मेरी दुआ होते थे,
आज भी हैं उन्हें आखिर मैं रुलाऊँ कैसे ?
उनकी आदत है भुलाने की, भुला दें हमको,
कुछ भी कहूँ मगर उनको भुलाऊँ कैसे ?

" फिजा में चमकते सितारे मिलेंगे "

फिजा में चमकते सितारे मिलेंगे ,
हमारे तुम्हारे इशारे मिलेंगे ।

भटक भी गये बीच मजधार में तो ,
कहीं न कहीं तो किनारे मिलेंगे ।।

अगर छद्म होगा न मन में तुम्हारे ,
तेरी राह पे पुष्प - न्यारे मिलेंगे ।।

नही सीखना तुम कभी द्वेष करना ,
जहाँ में तुम्हें लोग प्यारे मिलेंगे ।।

न हिन्दू, न मुस्लिम, न सिख इसाई ,
तुम्हें सर्वदा भाईचारे मिलेंगे ।।

जरा सा सम्हल के मगर पैर रखना ,
नही दर - बदर पे जुवारे मिलेंगे ।।

नहीं तर्जना , भर्त्सना तुम करो अब ,
चमकते हुए चाँद - तारे मिलेंगे ।।

निखरना अगर है तुम्हें सूर्य बनकर ,
जगत - ज्ञान जीवन में सारे मिलेंगे ।।

अगर इश्क में बेवफाई न होगी ,
तो शत्रु सदा तुमसे हारे मिलेंगे ।।

गली कूच में प्रेम के गीत गाओ ,
तुम्हारे हृदय को सहारे मिलेंगे ।।

मेरी दिलरुबा तुम जरा मुस्कुरा दो ,
तुम्हारी अदाओं के मारे मिलेंगे ।।

ये दिलकश जवानी , ये अल्हड़ कहानी ,
के चर्चे घरों में हमारे मिलेंगे ।।

" सूनापन "

सूनापन छाया है मुझमें, एक उदासी सी छाई ,
जीवन सारा वियोगमय है, देखो ऋतु वसन्त आई ।

मैं रोता हूँ, कमरे में इक, बैठ अकेला उनसे दूर ,
न समझें वेदना मेरी, कलियाँ हैं खुलकर मुस्काई  ।।

हृदय प्रकम्पित है, अन्तःस्थल में यह कैसा ऊहापोह ।
दारुण - हृदय रुदन करता है प्रकृति में हरियाली आई ।।

आज हुआ फिर से सम्वेदित फिर देखो मधुमास चढ़ा ।
जब - जब मैं मजबूर रहा, बस तब ही क्यों बारिश आई ?।।

बारिश की रिमझिम बूँदें तन पर पावक सी लगती हैं ।
आखिर फिर क्यों बरसे हैं ? तरुणी बन क्यूँ ली अँगड़ाई ?।।

ऊपर पूनम - चाँद सुशोभित, नीचे पवन सुगन्धित है ।
कई दिनों से दिखे नही तुम, पुनः तुम्हारी याद आई ।।

भ्रमरों का गुंजार श्रवणकर मन में टीस उभरती है ।
ये लो मैं जाने वाला हूँ और छलक कर वो आई ।।

02/09/2016

" पहले क्या थे ? आज हुए क्या ? "

क्या खोए ? क्या पाए सोंचो ?
पहले क्या थे ?आज हुए क्या ?
जो पहले समृद्ध कभी थे,
उनसे पूँछो आज हुए क्या ?

जीवन की सब गतिविधियों से,
गर्व हुआ करता था सबको ।
जिनके आश्रयदाता थे हम ,
उनसे पूँछो आज हुए क्या ?

कभी इसी पावन - धरती की,
इक हुंकार से जो डरते थे ।
ऐयासी में डूबे रहने से ,
पूँछो हम आज क्या हुए ?

देश में जिस स्त्री - जाति की,
लोग कभी पूजा करते थे ।
आज उन्हीं लोगों से पूँछो,
उनके साथ हैं आज हुए क्या ?

वल्लभ ,बोश ,और सिंह जैसे,
कितने वीर हुए धरती पर ।
कभी मर्द जो कहलाते थे ,
उनसे पूँछो आज हुए क्या ?

शिक्षक - शिक्षा से भारत ने,
विश्व - पताका लहराया था ।
आज उन्हीं शिक्षा - शिक्षक से,
पूँछो के हैं आज हुए क्या ?

जो तप, सन्ध्या - वन्दन आदि से,
ब्रह्मज्ञानी कहलाते थे ।
उसी देश के ब्रह्मज्ञों से पूँछो,
हैं, वो आज हुए क्या ?

जो अपने उत्तम कर्मों -
के द्वारा विश्व - पटल को जीते ।
आज उन्हीं की हम सन्तानों से,
पूँछो, हम आज हुए क्या ?

विश्वामित्र , कण्व के जैसे,
ऋषि - गण कभी हुआ करते थे ।
लोभ , मोह, माया में फंसकर,
उनसे पूँछो आज हुए क्या ?

संस्कृत, संस्कृति और सभ्यता,
के प्रतीक जो कहलाते थे ।
दूषित - वाणी, गन्दे पहनावे से,
पूँछो ! आज क्या हुए ?

" जब तक पावन मातृभूमि पर "

जब तक पावन मातृभूमि पे,
मुझ जैसे दीवाने होंगे ।
हृदय - गीत गाए जाएँगे,
गज़ल, गीत और गाने होंगे ।।1।।

कलियों पर भँवरे मड़राएँ,
वो पराग - दीवाने होंगे ।
प्रेम - विरह में जलते जाएँ,
कुछ ऐसे परवाने होंगे ।।2।।

तुम रोते हो इसके पीछे,
आखिर! कुछ अफसाने होंगे ।
जीवन मात्र चार - पल का है,
कष्टों को अपनाने होंगे ।।3।।

मित्रों से है जीवन सारा,
कार्य में हाँथ बटाने होंगे ।
बोझ नही होगा सर पे जब,
दुःखों से अन्जाने होंगे ।।4।।

दुल्हन आए कमरे में,
के पहले सेज सजाने होंगे ।
युग बदला तुम भी बदलो,
दुल्हन के पैर दबाने होंगे ।।5।।

जैसे ही युग अँगड़ाई ले,
गीत बदल कर गाने होंगे ।
ज़रा बताओ बातें अपनी,
किस्से नये पुराने होंगे ।।6।।

होंठों पे हो प्रेम की भाषा,
हृदय से हृदय मिलाने होंगे ।
दुश्मन भी आ गले मिले जब,
पुष्प-वृष्टि बरसाने होंगे ।।7।।

मित्र - मण्डली की बैठक में,
चाय - पान फिर पाने होंगे ।
कई दिनों के बाद मिलेंगे,
अपने नये जमाने होंगे ।।8।।

सारे गज़ल, गीत, छन्दों को,
जन - जन तक ले जाने होंगे ।
अन्धकार मिट जाए सारा,
ऐसे दीप जलाने होंगे ।।9।।

कलम तुम्हारी सारस्वत है,
तुमको छन्द बनाने होंगे ।
जहाँ - जहाँ तक 'नील' न पहुँचा,
वहाँ - वहाँ पहुँचाने होंगे ।।10।।

" सिने जगत और जनता "

आज के चलचित्र बत्तर और हैं अश्लील होते,
गड़ रहे हैं ये हृदय में जैसे कोई कील  होते ।

है प्रभावित आज की जनता हनी सिंह और सनी से,
एक के हैं वस्त्र छोटे, दूजे बाल नुकीले होते ।।1।।

भाव के गाने नही हैं और न वो भंगिमा ।
देखने को मिल रहे हैं ऐसे गाने शील होते ।।2।।

बस यही केवल नही इनके सदृश कितने वहाँ पे ।
तन दिखाते ,चिपकते हैं, दिखते हैं रंगीन होते ।।3।।

बिकनियों से स्तन छुपाए डांस करती फ्लोर पे वो ।
और लाखों, करोड़ों जन देखते हैं भील होके ।।4।।

न रहे वो शब्द, वो अल्फाज़, वो संवाद अब ।
दिख रहे हैं भाव सारे इस समय सड़्गीन होते ।।5।।

देखने को मिल रहा इन पिक्चरों से अब यही ।
जैसे कोई पुरुष - स्त्री करते नंगी सीन होते ।।6।।

वो समझती हैं परी खुद को, नही मालुम उन्हें ।
आज उनकी वजह से हैं अदालतों में दलील होते ।।7।।

आँख पे पर्दा पड़ा है इस नगर की रोशनी से ।
जिस्म का व्यापार है बस इसमें न कुछ फील होते ।।8।।

छोटे कपड़े देखकर हैं गिद्ध प्रायः लोग बनते ।
जिनके घर इज्जत लुटी है, उनके घर गमगीन होते ।।9।।

"खून की नदियाँ बहेंगी "

खून की नदियाँ बहेंगी घर तुम्हारे शोर होगा,
जिस्म के टुकड़े करेंगे, तांडव घनघोर होगा ।

भूल जाओ देश को ,न इस कदर वाणी निकालो,
राग न, कोई द्वेष न बस शोक ही चहुँओर होगा ।।1।।

जान भी न पाओगे के कौन मारा? कौन काटा ?
सोंच भी न पाओगे, तुम सोंचोगे कोई और होगा ।।2।।

युद्ध जब होगा भयंकर शस्त्र छोड़ेंगे सभी ।
देखने को तब मिलेगा कौन किसकी ओर होगा ?।।3।।

हिन्दु हैं हम और हिन्दोस्ताँ हमारी जान है ।
देशद्रोही प्राणियों का सिर, हमारा पैर होगा ।।4।।

हो चुकी हत्यायें निर्मम देश में इस, प्राणियों की ।
सोंचा छोड़ो गलतियाँ हैं कोई भटका चोर होगा ।।5।।

पुनः इन चिंगारियों को छेड़कर न आग देना ।
भूख से मर जाओगे और हाँथ न इक कौर होगा ।।6।।

क्रोध से तुम रक्तरंजित न करो ऐ पाकवासी ।
वरना !भारत माँ के चरणों में तेरा सिरमौर होगा ।।7।।

हों भले ही देश में अब कितने ही आतड़्कवादी ।
रात काटेंगे वहाँ पे, आर्यावर्त में भोर होगा ।।8।।

लाशों को दफ्नाओगे कैसे ? ओ पाकिस्तानियों ।
न जगह तेरे लिए है, न ही कोई ठौर होगा ।।9।।

हिन्दु का तात्पर्य केवल हिन्दुओं से है नही ।
मुख पे भारतवासियों के नाद अब पुरजोर होगा ।।10।।

17/08/2016

" गजल "

हूँ मैं बन्जारा तो बन्जारा रहने दो ।
बुलाओ ना हमें आवारा रहने दो ।।

तुम्हारे बिन अकेला हूँ जहाँ में हमनसी मेरे,
ज़रा फ़र्माइए मुझसे के क्या हैं? आशियाँ तेरे ।
मेरी जानम बता दो मुझको न कुछ और कहने दो ।।

समन्दर ज़ोर से लहरें उठाता फेंकता बाहर,
किनारे रोंकते ,अंकुश लगाते आज सरहद पर ।
मेरे दुःख दर्द बस मेरे उन्हें अब मुझको सहने दो ।।

तुम्हारे बेवफा -अन्दाज़ को कैसे बयाँ कर दूँ,
तज़ुर्बा है नही मुझको तुम्हें कैसे नया कर दूँ ।
कहर सा ढ़ह रहा है आज इसको और ढ़हने दो ।।

चली थी तीर जिन आँखों से उन आँखों का आशिक हूँ,
हुई थी बात जो मुझसे उन्हीं बातों से वाकिफ़ हूँ ।
सजा लो ,आज पलकों पे मुझे बस प्यारा रहने दो ।।

हमेशा याद आती हैं घनी जुल्फों की वो छाया,
सदा ही संग चलती हैं तेरी परछाई बन साया ।
मैं भावों में अगर बहता हूँ तो भावों में बहने दो ।।

हूँ मैं बन्जारा तो बन्जारा रहने दो ।
बुलाओ ना मुझे आवारा रहने दो ।।

29/07/2016

" पाकिस्तान ? "

हमें तुम जोश में न लाओ,
वरना ! राख कर देंगे ।
अगर उँगली उठी तेरी,
सुपुर्द - ए - खाक कर देंगे ।।1।।

हमारी शक्ति को ललकार मत,
शमशान कर देंगे ।
तुम्हारे पाक को पूरे हम,
कब्रिस्तान कर देंगे ।।2।।

मरे अफजल, मरे कसाब,
मरा बुरहान धरती पर ।
ये भारत है यहाँ आतड़्क किये,
तो मार हम देंगे ।।3।।

कफन सर पे सजा कर लोग,
चलते हैं शरहदों पर ।
अगर आवाज निकली तो,
कफन हम दान कर देंगे ।।4।।

मिलाएँगे नजर तब तक ,
कि जब तक शान्त बैठोगे ।
अरे हिजबुल ! जरा भी मुँह खुला,
वीरान कर देंगे ।।5।।

कभी आओ तुम अपनी,
फौज पूरी लेके भारत में ।
अगर कश्मीर को देखे,
तो कत्ले - आम कर देंगे ।।6।।

कभी खामोश शेरों के,
इशारों को समझ लेना ।
नही बोलेंगे मुख से कुछ,
लहूलुहान कर देंगे ।।7।।

सलामत चाहते खुद को,
तो गीदड़ - भपकियाँ छोड़ो ।
नही तो अपने पैरों पे,
तुम्हारी जान कर लेंगे ।।8।।

अरे नवाज ! जरा सा सोंच के,
तुम लफ्ज को बोलो ।
नही, बालक यहाँ के,
जंग का ऐलान कर देंगे ।।9।।

तुम्हें अल्लाह की रहमत,
नही मिल सकती जीवन में ।
कि जब दफ्नाएँगे हम लाश,
एक अजान कर देंगे ।।10।।

तुम्हें यह ज्ञात होना चाहिए,
कि शेर बैठे हैं ।
अगर तुम सर - हिला बैठे,
तो बन्जर - रान कर देंगे ।।11।।

नही हो जानते सईद ,
हमारी हैसियत को तुम ।
हम अपनी माँ पे अपनी,
जिन्दगी कुर्बान कर देंगे ।।12।।

अरे नापाक ! पाकिस्तानियों,
यूँ ख्वाब न देखो ।
तुम्हारे पाक पे हम अपना,
हिन्दुस्तान कर देंगे ।।13।।

मियाँ नवाज ! पुनः न बोलना,
कश्मीर को लेकर ।
हम अपनी माँ के चरणों में,
ये सारा जहान कर देंगे ।।14।।

22/07/2016

" काशी ''

 काशी की महिमा क्या गाऊँ घर - घर यहाँ शिवाला है ।
 जितने उनके भक्त यहाँ हैं सबके संग मतवाला है ।।

नील करे है नमन आपको नीलकंठ स्वीकारो अब,
चरणपादुका में सर रखा हूँ नटराज पधारो अब,
जीवन को जो धन्य बना दे ऐसा भोला - भाला है ।।

 न लेते हैं दही, मलाई न लेते सोना चाँदी,
 न श्रृंगार करें वो अपना न वो उसके शौकी,
 मात्र लेश भर भस्म लगा दो बस प्रसाद भंग प्याला है ।।

 एक तरफ माँ अन्नपूर्णा दुखियों के दुःख दूर करें,
 अहंकार जिसमें भर जाए महादेव फिर चूर करें,
 ऐसा मञ्जुल - दृश्य सुनहरा मेघ जहाँ पर काला है ।।

 कालहरण हैं भैरव बाबा सदा यहाँ विश्राम करें,
 संकट मोचन हनूमान जी राम - भजन मे शाम करें,
 काशी की धरती पे प्यारा संगम बड़ा निराला है ।।

 पापहारिणी गंगा - माँ सब पाप हरण कर लेती हैं,
 शुभ्र - वर्ण की सरस्वती संताप हरण कर लेती हैं,
 शमी -  पत्र हैं अर्पित करते हाँथ मंदार की माला है ।।

 पाँच - पाँच विश्वविद्यालय हैं, राजधानी है शिक्षा की,
 साधु - संत का गढ़ है काशी, उचित व्यवस्था दीक्षा की,
 कई देश के लोग यहाँ, पर भेद न गोरा - काला है ।।

  इसी बनारस सारनाथ से राष्ट्रचिह्न हैं ग्रहण किये,
  इसी बनारस कालनगर में जाने कितने शरण लिये,
  पंचक्रोशी की यात्रा करके  कितनों ने दुःख टाला है ।।

 काशी मोक्षदायिनी नगरी लोग यहाँ मरने आते,
 मणिकर्णिका, हरिश्चन्द्र पर इच्छावश जलने आते,
 मोक्ष प्राप्त कर जाते हैं वो साथ में डमरू वाला है ।।

 सुबह भोर में उठकर सारे संत - महात्मा ध्यान करें,
 महादेव से सुबह यहाँ पे महादेव से शाम करें,
 महादेव पे वारि जाऊँ ऐसा क्या रंग डाला है ।।

 काशी की महिमा क्या गाऊँ घर - घर यहाँ शिवाला है ।
 जितने उनके भक्त यहाँ हैं सबके संग मतवाला है ।।

1 " छाया है गहरा अन्धकार "

ये बच्चे अभी तुम्हारी सोच से परे हैं, इन्हें जीने दो !












छाया है गहरा अन्धकार,
ऐसे में कुछ कर लो विचार ।।

संसार - समर सा लगता है
दुर्बल - जनमानस दिखता है
भाई , भाई को काट रहा,
बेटा  माँ - बाप को डाँट रहा
अब प्रेम का मौलिक - रूप नही
खिलने वाली वह धूप नही
अंगार पे चलते लोग यहाँ
पत्थर से लड़ते लोग यहाँ
हम उनसे क्या टकरायेंगे
क्या उनको मार भगायेंगे
जब घर वाले ही खन्जर हैं
आवारे हैं, सब बन्जर हैं
वो आ समक्ष ललकार रहा
प्रतिक्षण करता वो वार रहा
हम पीछे भगते जाते हैं
बस पीठ पे गोली खाते हैं
ऐसे समयों में दूर रहो
यूँ कहो न ,मुझसे करो प्यार ।।
                         
 ईराक हो या अफगान यहाँ,
सीरिया हो या जापान यहाँ
यूरोप में गोले बरसे हैं
खाने - पीने को तरसे हैं
अब खून से सड़कें लाल हुई
लोगों के जान की काल हुई
माँ पुत्र का चिथड़ा तन लेकर
परिजन का वो क्रन्दन लेकर
जाने कैसे सोई होगी
जाने कैसे रोई होगी
आँखों से आँसू सूख गये
जो पास कभी थे दूर गये
अब कैसे वह जी पायेगी
निश्चित पागल हो जाएगी
दुनिया को कुछ भी लगे मगर
मुझको ये बात रुलाती है
ऐसी स्थिति को तुम भी समझो ।
पश्चात करो बातें हजार ।।

नीरवता मुझको दिखती है
विह्वलता तम पर लिखती है
मार्तण्ड अदृष्ट सा लगता है
अब वह प्रचण्ड सा दिखता है
घनघोर निराशा सी छाई
यह देख मृत्यु - आँधी आई
सब नष्ट - भ्रष्ट हो जायेगा
यदि उसको मीत बनायेगा
यह देख सामने काल खड़ा
है लिए रूप विकराल बड़ा
मुख का आकार नही इसके
तन का विस्तार नही इसके
पर हैं विचार निकृष्ट बहुत
वह मारेगा , है धृष्ट बहुत
किस तरह उसे समझाऊँ मैं
किस मार्ग से उस तक जाऊँ मैं
इस निर्मम - विकट परिस्थिति में ।
प्यारी ! बातें न करो चार ।।

 वह धीरे - धीरे बढ़ता है
निज - लक्ष्य को सुदृढ़ करता है
ऐसी प्रचण्ड सी खाई है
अब पास नही परछाई है
पर डरो नही सत्कारो तुम
अपने विचार से मारो तुम
वह मूर्ख नही यह ज्ञान करो
बातें करने में ध्यान धरो
वरना, वह खूब रुलायेगा
तन काट - काट तड़पायेगा
कलुषित विचार वो रखता है
ईश्वर से भी न डरता है
आगन्तुक है बिभीषिका कल
उसको तू सोंच समझ कर चल
प्रज्ञा - प्रयोग में लाओ अब
उसको भी गले लगाओ अब
हे प्रियतम ! ऐसे जीवन में ।
तुम समझो कुछ मेरे विचार ।।

पर सोंच समझ के कार्य करो,
पहले देखो फिर वार करो
वरना प्यारे! फँस जाओगे
जा दलदल में धँस जाओगे
अब उठो शेर! रणभेरी है
तेरे आने की देरी है
और हाँथ में इक शमशीर रखो
तुम युद्ध करो और वीर बनो
मारो उसको, काटो उसको
सौ टुकड़े कर बाँटो उसको
मैं फरसा लेके आता हूँ
उसका सर पैर में लाता हूँ
मैं आवारा कहलाऊँगा
मैं हत्यारा कहलाऊँगा
इसका मुझको दु:ख दर्द नही
भारतीय हूँ मैं, नामर्द नही
मैं बोल चुका जो कहना था ।
प्रियवर क्या हैं तेरे विचार? ।।

छाया है गहरा अन्धकार ।
ऐसे में कुछ कर लो विचार ।।


" गीत गाता हूँ मैं "

गीत गाता हूँ मैं,
                   गुनगुनाता हूँ मैं ।
एक तुमको हृदय में,
                    बसाता हूँ मैं ।।
तन ये अर्पित किया,
                मन समर्पित किया ।
आत्मा की धरातल पे,
                         पाता हूँ मैं ।।
जीत लो ये जमीं,
                     जीत लो आसमाँ ।
पास आओ कि तुमको,
                          रिझाता हूँ मैं ।।
तुम हृदयस्पर्शिनी,
                         मेरी प्रियदर्शिनी ।
बातें तुमको ही सारी,
                           बताता हूँ मैं ।।
मेरी जीवनलहर,
                        मेरी आह्लादिनी ।
अपनी कविताएँ तुमपे,
                          बनाता हूँ मैं ।।
मुझको कुछ भी कहो,
                           अब सजा चाहे दो ।
हृदय की गति को अपने,
                                   सुनाता हूँ मैं ।।

" वो हमें हम उन्हें भूल जाने लगे "

वो हमें हम उन्हें भूल जाने लगे ।
पास आए मगर दूर जाने लगे ।।

गुल में जो साज थे सारे झड़ने लगे,
शूल आके हृदय में जो गड़ने लगे ।
वक्त की आँधियों ने बदल सब दिया,
आज वो ही हमें आजमाने लगे ।।

एक अर्शे से चाहत थी जिस बात की,
बात हो कुछ हमारे मुलाकात की ।
तोड़ डाले सभी भाव - बन्धन के वो,
जिनको पाने में शायद जमाने लगे ।।

अभ्र से सब्र जब टूट जाते हैं तो,
वादियों से घटा छूट जाती हैं तो ।
इश्क जब प्यार से रूठ जाता है तो,
हम उन्हें प्यार से तब मनाने लगे ।।

लफ्ज मुख से निकलते नही वक्त उस,
वो मुझे देखकर रोज होते हैं खुश ।
पर परेशाँ तो होते हैं वो भी कभी,
मुझसे नजदीकियाँ वो बढ़ाने लगे ।।

मैं भी था प्यार पे अपने बिलकुल अड़ा,
भाव के बन्धनों को रहा था बढ़ा ।
वक्त की साजिशों से पलट सब लिया,
अब मुझे प्यार से वो बुलाने लगे ।।

फिर चली सर्द - वायु  उसी रात को,
उसने खोली हमारी गई बात को ।
मुझको याद कराया मेरा पहला दिन,
पुनः आपस में प्यार जताने लगे ।।

जो भी थी दूरियाँ सारी मिट अब गई,
जो गलत - फहमियाँ थी सिमट सी गई ।
एक - दूजे लिपट कर गले हम मिले,
वो हमें, हम उन्हें पास पाने लगे ।।

वो मेरी भावनाओं को सुनती गई,
साथ ही ख्वाबों को अपने बुनती गई ।
आसमाँ के तले नील लेटे हुए,
एक - दूजे के सपने सजाने लगे ।।

वो हमें हम उन्हें भूल जाने लगे ।
पास आए मगर दूर जाने लगे ।।

" वसन्त और तुम "

यह कुसुम पवन सब बार - बार,
उन चरणों को छू जायें हैं ।
नव रस का जो मिथ्याभिमान,
नतमस्तक सम (सामने ) हो जाए है ।।

जब चलती हैं वो नदियों में,
नदियाँ भी हिलोरे खाएँ हैं ।
जब उतरें वो सागर में तो,
वह चरण चूमने आये है ।।

वन, उपवन की क्या बात कहें,
जो स्वयं ही आश लगाए हैं ।
वह कोमल - कोमल तृण जो हैं,
न छूने से मुरझाए हैं ।।

मुखड़ा उनका इतना सुन्दर,
कि चाँद भी शीश झुकाए है ।
जल, थल, नभ सब गर्व करते,
मुखड़े का दर्शन पाये हैं ।।

हैं कोमल, मधुर अधर उनके,
मधुशाला सी ढरकाए हैं ।
जब निकले हैं बाहर को वो,
स्वागत में बारिश आए है ।।

मीठी इतनी वाणी उनकी,
कि कोयल भी ललचाए है ।
उस वाणी के श्रवणातुर जन,
अरसिक रसिक हो जाए हैं ।।

हैं कपोल कोमल उनके,
मानो की कमल समाये हैं ।
हैं आज हमारे सामने वो,
गालों पे लालिमा लाए हैं ।।

है मधुशाला उन नयनों में,
जिनको देखे ललचाए हैं ।
हैं मृगनयनी उनकी आँखें,
उनमें ही प्राण समाएह हैं ।।

बालों की क्या बातें करना,
जो रातरानि महकाए हैं ।
छूने में हाँथ गर्व करता ,
सूँघने पे वो इठलाये हैं ।।

है सुमेरु - स्तन उनका,
हम देख - देख हर्षाए हैं ।
हैं शर्मीली इतनी वो कि,
कुच पे वे हाँथ लगाये हैं ।।

है शर्म, हया इतनी उनमें,
कि बातों से डर जाए हैं ।
है छुई - मुई उनकी आदत,
छूने पर वो शर्माए हैं ।।

21/07/2016

" इक्कीसवीं सदी और हम "

इक्कीसवीं सदी है और इतनी बन्दगी है,
खामोश है जमाना खामोश जिन्दगी है ।
सूखी हुई हैं आँखें न पेट मे निवाला,
अभियान चल रहे हैं और इतनी गन्दगी है ।।

कुछ लोग दूसरों के बढ़ने से जल रहे हैं,
कुछ लोग मुकद्दर को अपने बदल रहे हैं ।
रोते वही हैं प्रायः जो शान्त हो गये हैं,
जो रेस में लड़ते हैं वो ही सँभल रहे हैं ।।

विद्वान यहाँ बैठे सब मूर्ख भर गये हैं,
जो पढ़ना चाहते थे वो छात्र मर गये हैं ।
पढ़ना - पढ़ाना है नही, भौकाल बनाना है,
जिनके है पास पैसा बस वो सँवर गये हैं ।।

जीवन बड़ा अजीब मुसाफिर सा घूमता है ,
पागल हुआ प्रसन्न सदा मस्त झूमता है ।
न द्वेष भाव उसमें, न राग की है आशा,
जो जैसे चाहता है वो वैसे लूटता है ।।

कितनी सड़क पुरानी टूटी हुई पड़ी हैं,
जो नई बन रहीं हैं फूटी सी लग रही हैं ।
जिनपे थी जिम्मेदारी, पैसे ही खा गये वो,
हर बात अब बड़ों (नेताओं) की झूठी सी लग रही हैं ।।

हैं कई ऐसे लोग जिनके सर नही है छत,
कितने तो एक्सीडेन्ट में होते हैं छत - विछत ।
डूबी है जवानी नशे में उनको क्या खबर,
कितने गरीब सोते हैं सड़कों पे सदा मस्त ।।

" एक तरफ मेरी माँ है और एक तरफ है प्यार मेरा "

एक तरफ मेरी माँ है और एक तरफ है प्यार मेरा ।
दोनों मेरा जीवन हैं दोनों में ही संसार मेरा ।।

अवगाहन करता हूँ अपनी माँ से सुनी कहानी में,
उसको मैं प्रायः देखूँ राधा जैसी दीवानी में,
एक कहानी अकथनीय है दूजे से विस्तार मेरा ।।

पिता, भाइयों, बहनों में भी प्यार अजेय सा दिखता है,
निश्छल और निष्कपट प्यार न बाजारों में बिकता है,
गुरुजन मेरे ईश्वर हैं उनसे ही सारा सार मेरा ।।

जीवन भी मुश्किल घड़ियों में कठिन परीक्षा लेता है,
भौतिकता जो सीख लिया इच्छा पूरी कर लेता है,
द्वार और घर छोटा है पर प्यार भरा परिवार मेरा ।।

स्वार्थ और नि:स्वार्थ भाव के लोग बहुत से दिखते हैं,
लोग यहाँ ऐसे भी हैं जो कुछ पैसों में बिकते हैं,
मित्र बहुत उत्तम हैं मेरे जीवन है साकार मेरा ।।

बहन नही कहता मैं सबको और नही कहना चाहूँ,
पर इज्जत करता हूँ सबकी सबके संग रहना चाहूँ,
किसी के भावों से मैं खेलूँ ऐसा न व्यवहार मेरा ।।

देशप्रेम करना चाहें और देशप्रेम हम करते हैं,
मातृभूमि पे नतमस्तक हैं, मातृभूमि पे मरते हैं,
प्यार हमें करना आता न देशद्रोह व्यापार मेरा ।।

कितने राष्ट्रभक्त फौजी दंगों में मारे जाते हैं,
कितने सैनिक बेचारों के संघ जलाये जाते हैं,
चाहूँ मैं ऐसे भक्तों को नमन करें स्वीकार मेरा ।।

गंगा की अविरल धाराएँ काशी में जो बहती हैं,
कल - कल, छल - छल करती मेरे कानों मे कुछ कहती हैं,
उठो पुत्र ! ले जाओ जीवन का सर्वस्व श्रृंगार मेरा ।।

बहुत क्लिष्ट शब्दों से अपनी कविताएँ वो लिखते हैं,
जनमानस के बीच नही विद्वानों में वो दिखते हैं,
 भावों की कविता लिखता, न शब्दों का बाजार मेरा ।।

अभी आपका अनुज हूँ मैं और अभी अनुज ही रहने दो ,
प्यार से मैं जीवन जीता हूँ ,प्यारी बातें कहने दो,
अभी मञ्च पे आया हूँ यूँ करो न जय जयकार मेरा ।।

एक तरफ मेरी माँ है और एक तरफ है प्यार मेरा ।
दोनों मेरा जीवन हैं दोनों में ही संसार मेरा ।।


रामराज कै रहा तिरस्कृत रावणराज भले है!

देसभक्त कै चोला पहिने विसधर नाग पले है रामराज कै रहा तिरस्कृत रावणराज भले है ।। मोदी - मोदी करें जनमभर कुछू नहीं कै पाइन बाति - बाति...