12/08/2019

पन्द्रह अगस्त



पन्द्रह अगस्त, पन्द्रह अगस्त, पन्द्रह अगस्त, पन्द्रह अगस्त
कहने को देश कृषक का है, दिखते हैं सारे कृषक त्रस्त ।

खेतों को आँसू से सीचूँ या कहो लहू से भर दूँ मैं
या आग लगाऊँ वृन्तों में, विपिनों को भस्मित कर दूँ मैं
कितनी डी.ए.पी और यूरिया भाँति - भाँति की खादे हैं
मरने वाले उन कृषक भाइयों की कितनी सौगातें हैं

बचपन से देख रहा हूँ कृषकों का चेहरा दिखा पस्त ।

घर से निकले सारे भाई औ' ज्यों ही पहुँचे सीमा पर
तड़तड़ - तड़तड़ गोलियाँ चली निकला है लहू पसीना पर
अन्तिम साँसों तक लड़े वीर सैनिक बस रक्षा की ख़ातिर
अक्सर कुर्बानी देते हैं अपनी भारत माँ की ख़ातिर

वो लोग अभी न घर पहुँचे सूरज देखो हो गया अस्त ।

जो पाँच साल की बच्ची से हो रहा है दुर्व्यवहार यहाँ
ये लोकतंत्र लेकर ढ़ोऊँ ? क्या देखूँ मैं संस्कार यहाँ?
हाँ बलात्कार पे बलात्कार होते रहते हैं आये दिन
कर देंगे भ्रूण - मृत्यु लेकिन जीना चाहेंगे बिटिया बिन

बच्चियाँ मौत के घाट हुई, हैं बहन, बेटियाँ पड़ी लस्त ।

कम्प्लेन हुई थी पहले दिन अब तक अपराधी मिला नहीं
बस इसी बात का दुःख मुझे उनको कोई भी गिला नहीं
खा लिये पान करते पिच् - पिच् चौराहों पर गाली बकते
झूठे चालान बनाते हैं ऊपरी खर्च अन्दर रखते

खा खाकर सरकारी पैसा है पुलिस यहाँ की मटरगस्त ।

जो रीत जहाँ की है यारों वो रीत चली ही आएगी
सबका है सबसे प्रेम यहाँ तो प्रीत चली ही आएगी
रह गया स्तब्ध जब भी आया देखा करके मैं आँख बन्द
इस भारतीय सम्बन्धों में दिखता मुझको ऐसा प्रबन्ध

सदियों से पड़ती आई है अब भी फाइल पे पड़ी डस्ट ।

मैं नमन करूँगा उन सबको जो हैं इसपर बलिदान दिये
नेता, मंत्री, सैनिक, जन हों जो भी इसका सम्मान किये
पर उन्हें कभी न छोड़ूँगा जिनके हैं पेट बड़े भारी
है मिलीभगत इन लोगों में खाते रहते पारापारी

ये लोकतांत्रिक - देश यहाँ नेता, मंत्री हैं सदा मस्त ।


08/08/2019

ये हिन्दू - मुस्लिम के बच्चे एक नहीं हो पाएँगे


कविताएँ लिख - लिख मर जाओ नेक नहीं हो पाएँगे 
ये हिन्दू - मुस्लिम के बच्चे एक नहीं हो पाएँगे 

संस्कारों की चादर तानों वादों के फरमान गढ़ो
ईश्वर - अल्लाह रोज मनाओ गीता और कुरान पढ़ो
कितना भी कुछ कर ले यारा! देख, नहीं हो पाएँगे 

पुनर्नवा करते करते ही अभिज्ञान हो जाएगा 
दोनों में फिर युद्ध छिड़ेगा सब श्मशान हो जाएगा 
रक्ताप्लावित होगा कुछ अवशेष नहीं हो पाएँगे 

संविधान कठपुतली होगा शोकगीत बन जाएगा 
हम हिन्दू हैं, हम मुस्लिम हैं यही महज़ हो पाएगा 
इसी देश में ईद और अभिषेक नहीं हो पाएँगे 

मुखिया हैं दोनों पक्षों में दोनों का खूँ खौल रहा 
धरती भी कम्पन करती है काल आग जब बोल रहा 
एक म्यान में दो तलवारें फेंक, नहीं हो पाएँगे 

04/08/2019

" नील " जगत अपनी गति चलता है छोंडों भी जाने दो


वो चुपचाप देखती मुझको मैं करता था नादानी 
उसके भीतर खामोशी थी मेरे अन्दर शैतानी 

हम सबके होते हैं सब मुझमें आकर बसते हैं क्या? 
कुछ रिश्ते दिल के होते हैं कुछ होते हैं बेमानी 

अब तक जितना भी देखा हूँ ये धरती, ये आँगन मैं 
चमकी आँखें,  देखी फसलें रंगों में धानी - धानी 

सन्तों का चोला है बाकी मन की बातें जानो तो 
ढोंग दिखावा संन्यासी का भीतर - भीतर अज्ञानी

अब बच्चों को फुर्सत कब है पढ़ने और पढ़ाने से 
कैसे वो बातें जानेंगें जिनमें हैं राजा - रानी 

कैसी दशा हुई है ? कैसा हाल हमारे भारत का ?
आँखों से आँसू रिसता है चेहरे प है हैरानी 

" नील " जगत अपनी गति चलता है छोंडों भी जाने दो 
गालिब रोये, तुलसी रोये, कौन सुना कबिरा - बानी 

29/07/2019

गिरी है "नील" वो शबनम कहीं पर


युँ ही लगता नहीं है मन कहीं पर 
दिखें जब तक नहीं हमदम कहीं पर

है भीतर शोर,  ख़ामोशी है बाहर 
हुआ कैसा ये स्पन्दन कहीं पर 

दरिन्दे देश में बढ़ने लगे हैं  
बचाती बेटियाँ दामन कहीं पर 

दिखे दोनों नहीं इक साथ मुझको 
कहीं विद्या दिखी तो धन कहीं पर 

चढ़ी है मुफलिसी सर पर हमारे 
लगे अच्छा नहीं मौसम कहीं पर

कभी दिखते नहीं ख़ालिक बनें हैं 
बढ़े हैं खूब अब रावण कहीं पर 

सुबह से रो रहा मासूम बच्चा 
कहीं सूना पड़ा आँगन कहीं पर 

बिरहमन फूटकर रोते मिले हैं 
मुझे ऐसा दिख़ा आलम कहीं पर 

अजब उलझन मची भीतर हमारे 
कहीं पर तन हमारा, मन कहीं पर 

जिसे हम रात-दिन सोचा किये हैं 
गिरी है "नील" वो शबनम कहीं पर 

21/07/2019

आखिर जब तुम ही न होगे कैसा होगा ये जीवन



आखिर जब तुम ही न होगे कैसा होगा ये जीवन 
ना तुम होगी, ना हम होंगे, ना होंगे ये घर - आँगन ।।

क्या होंगे प्रासाद भवन सब तेरे आगे फीके हैं 
तुझको, तुझसे ज्यादा चाहें बस इतना ही सीखे हैं 
कितने बादल घेरे - घुमड़े तुम पर असर नहीं होता 
बरषा जैसी बरसी मुझपर मुझ बिन बसर नहीं होता 

ऐसे पल - पल बीत रहे हैं तुम बिन तड़पेगे सावन ।

उन अधरों पर गजल , गीत आखिर कैसे लिख पाऊँगा 
दूर रहोगे मुझसे ही गर कैसे साथ निभाऊँगा 
तुम ही बोलो मधुर - मिलन उन बातों का फिर क्या होगा 
तुम ही बोलो अन्तहीन उन रातों का फिर क्या होगा 

सब श्रृंगार उतर जाएँगें टूट चुका होगा दर्पण ।

शब्दों की माला पहनाऊँ भावों से श्रृंगार करूँ 
तुमसे पहले महक तुम्हारी आये इतना प्यार करूँ 
कोरा - जीवन हो जाएगा औरों में बंट जाएगा 
यद्यपि इन अवसादों में भी ये जीवन कट जाएगा

महज़ वेदनाएँ भर होंगी और रहेगा पागलपन ।

जहाँ - जहाँ हम बाग - बगीचों में जा बैठा करते थे 
कलरव करते आते पंक्षी विषय अनूठा करते थे 
सारे भाव उपस्थित होते आलम्बन , उद्दीपन के 
और जवानी के पर लग जाते थे उस पल सावन के 

कोयल जब भी कूँक उठाएँगी मन में होगी उलझन ।

आखिर जब तुम ही न होगे कैसा होगा ये जीवन 
ना तुम होगी, ना हम होंगे, ना होंगे ये घर - आँगन ।।

रात की काली चदरिया ओढ़कर हम चल दिये


रात की काली चदरिया ओढ़कर हम चल दिये 
मेरी दुनिया, मेरे मञ्जर, मेरे अपने हल दिये 

कुछ घड़ी, कुछ पल बिता सकता था मैं भी साथ पर 
जिस वख़त प्यासा रहा मैं उस वख़त न जल दिये 

और अब किससे गिले - शिकवे करूँ मैं उम्रभर 
वो डुबाए बीच में बोलो कहाँ साहिल दिये 

जिनसे आशाएँ बहुत थी, थे बहुत सपने सजे 
जिन्दगी दुश्वार करके वो मुझे दलदल दिये 

आँख मेरी अब खुली है जब तमाशा बन गया 
मेरे घर मुझको नही रखे, मुझे जंगल दिये 

जिनको मैं देखा नहीं जिनपे ये नज़रें न गई 
जिनको अपना मैं न समझा बस वही सम्बल दिये 

19/07/2019

उपनिषद के मंत्र जैसी है तुम्हारी भावना



उपनिषद के मंत्र जैसी है तुम्हारी भावना
तुम वहाँ पर थी जहाँ पर वेद की थी छाँव ना ।।

एक क्या चौसठ कलाओं में सदातन जो बही हो
आयतों में और तुम वैदिक ऋचाओं में रही हो
तुम महाकवि कालिदासी - काव्यों की नायिका सी
हो लता मंगेशकर जैसी अनूठी गायिका सी
हैं थिरकते पैर जैसे पार्वती का लास्य हो
और हँसनें की कला यूँ है लगे मधुमास हो

आज भी भाता तुम्हें अपना पुराना गाँव ना ।।

दर्शनों के गूढ भावों का अनोखा सार हो तुम
और भाषाओं का जीता जागता परिवार हो तुम
तुम नहीं अभिनेत्री पर क्या कहूँ अभिनीय हो
रूप, यौवन, ज्ञान, धन से सच अनिर्वचनीय हो
दूर कर अज्ञान तुम करती रही हो आवरण
ज्ञान देती हो, पढ़ाती प्यार का तुम व्याकरण

द्वैत को अद्वैत में बदला किया अलगाव ना ।।

14/07/2019

" नील " मेरे ख़याल लोगे क्या


रंग मुझसे गुलाल लोगे क्या 
आश़िकी की मिसाल लोगे क्या 

इश़्क है ज़ीन में मेरे भीतर 
इश़्क बोलो निकाल लोगे क्या 

भागती है तो भाग जाने दो 
अपने सर पे बवाल लोगे क्या 

रात - दिन इंतज़ार करते हो 
खुद को ऐसे सम्हाल लोगे क्या 

छोड़ दो या कि साथ ही ले लो 
फैसला, एक साल लोगे क्या 

रोज इज्जत से चाय देते थे 
आज ना हालचाल लोगे क्या 

छोड़ दो बन्द भी करो ड्रामा 
न्याय में अब दलाल लोगे क्या 

और नजदीकियाँ बढ़ाते हो 
" नील " मेरे ख़याल लोगे क्या 

@नीलेन्द्र शुक्ल " नील "
#Poetrywithneel

26/06/2019

कंकर शंकर कर गुज़रा हूं



बाहर भीतर से गुज़रा हूं 
मैं तेरे घर से गुज़रा हूं

तू गुजरी है मुझमें होकर
मैं तुझमें होकर गुजरा हूं 

मेरी बातें जुबां तुम्हारी 
डीदा ए तर से गुज़रा हूं 

आयात और ऋचाएं गूंजी
कंकर शंकर कर गुज़रा हूं

देख रहे हो जमीं जमीं पर
मैं अम्बर अम्बर गुजरा हूं 

होंठ लिपटे हैं, नजर बंद, कमर हांथों में



तेरे शहर में, तेरे साथ मेरा प्यार चले
साथ तेरा रहे यूं मौसम ए बहार चले

जिन्दगी खुशनसीब जन्नत ए चमन जैसी 
तू जो आए तो मेरे सारे गम गुजार चले 

रूप है चांद सा, ख़ुशबू है रातरानी सी 
रात संग बैठकर अपनी ग़ज़ल संवार चले 

होंठ लिपटे हैं, नजर बंद, कमर हांथों में
खूबसूरत रहा लम्हा वो बार बार चले

लोग पढ़ते हैं, देखते हैं और सुनते हैं 
तुम्हारी रूह निकाले यहां उतार चले 

एक चलने से तेरे, ये जहां चलता है 
नील के साथ तुम चले तो बेशुमार चले 

खींचता होंठ का तुम्हारे तिल



तुम्हें मिला तिरी खबर जाना 
आज तुमको मैं बेखबर जाना 

दुआ में मांगते हैं लोग मुझे 
बात ये आज इस सहर जाना 

खींचता होंठ का तुम्हारे तिल
और सबकुछ है बेअसर जाना 

आई घर से वो सुर्ख आरिज़ में
दे दिया दांत का असर जाना 

एक इक गोद में तुम्हारे सर 
एक तुझमें मेरा बसर जाना 

और क्या कर दिया कहो, तुमको 
देखता नील दर ब दर जाना

तिरंगा बेटियां लहरा रही हैं


कहीं पर कोयलें कुछ गा रही हैं 
मधुर संगीत की धुन आ रही है 

निकलकर आज दरवाजों से बाहर 
तिरंगा बेटियां लहरा रही हैं 

तुम्हारे आंख की ख़ामोशियां सब 
हमारी आंख से बतला रही हैं 

खुली रंजिश में टकराता है भारत 
हमारे देश की दरियादिली है 

मुहब्बत सरफ़रोशी की तमन्ना 
मुहब्बत ही जमीं समझा रही है 

हृदय आकांक्षा से भर गया है 
बालाएं जो रही वो जा रही हैं

कहां से छू गई मुझको सरापा
हवा ये नील को बहका रही है 

चली आई मुझे शंकर बनाने



कभी ईश्वर कभी कंकर बनाने 
लगा घर सा कोई अन्दर बनाने 

सती के रूप में मेरी मुहब्बत
चली आई मुझे शंकर बनाने 

बहुत सी बात थी खामोशियों में
जुबां उसको लगी जर्जर बनाने 

चुनावी मसअला छाने लगा है 
लगे अब खुशनुमा मंज़र बनाने

अधूरी सांस भी थी टूटने को 
तभी वो आ गए रहबर बनाने 

मुहब्बत नील का पर्याय है सर 
इसे क्यों आ गए कमतर बनाने 

01/05/2019

मजदूरों को कब किसनें फुर्सत देखा


अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस की हार्दिक शुभकामनायें 😭-
ये इनको खुश करने की है चाल महज 
मजदूरों को कब किसनें फुर्सत देखा

30/04/2019

जा मौज़ करा ई चुम्बन दिन


आलम्बन दिन उद्दीपन दिन 
जा मौज़ करा ई चुम्बन दिन 

दुई - दुई  के पाँति बंधी अहै 
आपस मा दुइनौ बिज़ी अहैं 
आँखिन मा आँख घुसेरे हैं 
चुम्मू पर वै मुँह फेरे हैं 

ओहके अब मन ललचान अहै 
कइद्या उनके अभिनन्दन दिन 

घर से सज धज के निकरे हैं 
खाना - पानी सब बिसरे हैं 
आँखिन मा लाखन ख़्वाब अहै 
हाँथन मा फूल गुलाब अहै 

कुछ के ख़ातिर ई अच्छा है 
कुछ के ख़ातिर ई लंठन दिन 

पइसा से पर्स भरे रइहा 
वै जउन कहँय ओतने करिहा 
बड़का ऊ मॉल घुमावत थीं 
रसगुल्ला चाट खवावत थीं 

कुछ हार, अँगूठी ड्रेस देइहैं 
कुछ बिंदिया चूड़ी कंगन दिन 

बातन - बातन मा प्यार बढ़ा 
मूढ़े चुम्बन त्यौहार चढ़ा 
नाचब गाउब बढ़िया होइहैं 
हमरे - तुम्हरे लरिका होइहैं 

वै दूनौ बातैं करत रहें 
हरदी माटी औ चन्दन दिन

जिस्म हमारा इक पल का, इक पल सा मैं

Lover of Mother Father & Lover.

कुछ चीजों में सच में बहुत निकम्मा हूँ कुछ चीजों में बिल्कुल गंगाजल सा मैं

मुझको मत देखो, अपनी आँखें देखो देखो चिपका हूँ उनमें काजल सा मैं

तेरी मम्मी मुझको ऐसे देख रही जैसे उनकी बिटिया का हूँ कल सा मैं

तुम बारिश हो मेरे भीतर रहती हो मैं फैला आकाश, तेरा बादल सा मैं

जब से तुमसे प्यार हुआ माँ कहती है बेटा है बदमाश बहुत, पागल सा मैं

और छनकने लगती हो तुम मेरे संग तेरे नाज़ुक पैरों का पायल सा मैं

मेरी माँ नें कठिन तपस्या की होगी तब जाकर वो पाई मुझको, फल सा मैं

नील तुम्हारे बीच हमेशा होगा पर जिस्म हमारा इक पल का, इक पल सा मैं

29/04/2019

हर जख्मों की एक दवा तेरा चुम्बन


करता ही रहता है अक्सर आलिङ्गन हर जख्मों की एक दवा तेरा चुम्बन

वो रहती है अक्सर मेरी बाहों में इससे ज्यादा क्या होगा दीवानापन

आजीवन की एक पालिशी जैसी है डूबा हूँ उसमें, वो मेरा जीवनधन

उसके चेहरे जैसा दूजा क्या होगा चौबिस घंटे लगती एक सजी दुल्हन

आओ ना घर मिलते हैं भैया भाभी फिर से हरा - भरा हो जाये घर आँगन

नील उसे जैसे देखा दिल हार गया माँ! इतनी चुम्मू है उसकी जानेमन

देखे पसन्द करके उसको मना किया


खाला का घर नहीं है जो मन हुआ किया
देखे पसन्द करके उसको मना किया 

क्या सोंचती होगी कि कहाँ कौन कमी है 
इस दौलत - ए - नाचीज़ नें क्या - क्या करा दिया 

खुद से हुई है नफ़रत उसको रुला दिया 
कुछ दिन के लिए उसको ये सिलसिला दिया 

तुम तो पढ़े लिखे हो फिर भी ये हाल है 
घर ही मना न पाये तो क्या भला किया 

मन कर रहा था उठ के तमाचा मैं खींच दूँ 
कुछ सोच - समझकर के उनको विदा किया 

तू है कहाँ छुपा हुआ ओ नील ! बेख़बर 
उसका चराग़ उसने फिर से बुझा दिया  






हर बच्चों के पा - मम्मी हों

Neel 
फल फूल रहे न चटनी हो 
जीवन भर बुक न रटनी हो 

जीवन डूबा हो मस्ती में 
न फोन रहे न पत्नी हो 

उन लोगों से बातें करना 
जिन लोगों में न गर्मी हो 

पर बिटिया देख ताक लेना 
वो शायद नहीं अधर्मी हो 

उसके कमरे में जाओ पर 
बचना की न बेशर्मी हो

तेरी आँखों की मधुशाला
मेरी आँखों में चढ़नी हो 

डी.जे फीजे से बेहतर है 
शादी में बन्ना - बन्नी हो 

इतना भी पंख पसारो मत 
जेबों में नहीं चवन्नी हो 

मौला इतना एहसान करो 
हर बच्चों के पा - मम्मी हों 

इक बारी मुझे ख़बर करना 
हे नील! जमीं जब बिकनी हो 



28/04/2019

मेरे भीतर वो बनने की लियाक़त है तो है

Neel
मेरी आँखों में गर तेरी नज़ाक़त है तो है 
परीशाँ रात - दिन करता शरारत है तो है 

मुझे कब कौन रोका है मुझे कब कौन रोकेगा 
जो तुमसे हो गई है अब मुहब्बत है तो है 

हमारे पास में खुद को बहुत महफूज़ पाती है 
मेरा कर्त्तव्य है उसकी हिफाज़त है तो है 

मुझे कुछ भी नहीं खोना मुझे कुछ भी नहीं पाना 
मगर फिर भी ख़ुदा से ये इबादत है तो है 

मुझे मालूम है यारों मेरी ताक़त का अन्दाज़ा 
मेरे भीतर वो बनने की लियाक़त है तो है 

नहीं यूँ बोलना अक़्सर, बहुत बढ़चढ़ के बोले हो 
बड़े होने से प्यारे ! ये नसीहत है तो है 


रामराज कै रहा तिरस्कृत रावणराज भले है!

देसभक्त कै चोला पहिने विसधर नाग पले है रामराज कै रहा तिरस्कृत रावणराज भले है ।। मोदी - मोदी करें जनमभर कुछू नहीं कै पाइन बाति - बाति...