17/01/2017

आज से है जंग मेरी इस नियति के बाप से

फूटती चिंगारियाँ हैं जिस्म के किस ताप से
ये पसीना नम किया है या हुआ है भाप से
आज ये धधकी हुई आँखें चिता सी जल रही
जख़्म के इस दर्द से या रक्त हैं संताप से

बादलों से भाव घिरते छोड़ते हैं द्वारे - मन
कशमकश में हैं पड़े पापी हुए किस पाप से

पीठ की रंगत फ़कत है लालिमा ओढ़े हुए
हाँथ को भी कर रहा है वो गठीला आप से

देखना भी बन्द कर देंगें स्वयं परछाइयाँ
खत्म होता जा रहा जीवन नियति के शाप से

आज सारे धर्म का बस चाहता हूँ इल्म मैं
कौन ऐसा मंत्र बोलूँ मुक्त कर दूँ जाप से

है अभी क्या उम्र आखिर बेड़ियों में कश रहे
रोशनी थोड़ा जलाओ डर रहे हैं रात से

यूँ नही तुम माथ टेको यूँ नही पैरों गिरो
तुच्छ प्राणी हैं सभी कब सीखते हैं बात से

और यदि मासूमियत का ये भला - परिणाम है
आज से है जंग मेरी इस नियति के बाप से ।।

05/01/2017

गीत (ओ री सखि )

ओ री सखि तोसे नैना लड़े निसदिन ।
काटूँ दिन रात अपने घड़ी गिन - गिन ।।

ज्ञान ,विज्ञान तू तू ही धन सम्पदा
साथ तेरा रहे जो ,कहाँ विपदा
मेरा ज्ञान बढ़ाओ निज शरण में लाओ
दु:ख दूर करो खुशियाँ बरसाओ ।

ज्ञान तुम बरसाओ रिमझिम - रिमझिम ।।

जैसा भी हो चरम इक तू सच सब भरम
संग साथ चलूँ तेरे जन्मों - जनम
तोसे लागी लगन भूला सब हूँ मगन
एकचित हो तुम्हें याद करता ये मन ।

तेरी दूरी सताए हर पल - हर छिन ।।

जाऊँ मैं बलिहारी तेरे रूप पे वारि
पुष्प अर्पित करूँ बन मैं फुलवारी
तेरे सपने सजाऊँ ,तुम्हें अपना बनाऊँ
नित संग रहूँ तोसे प्रीति बढ़ाऊँ ।

मैं अधूरा हूँ ,हे कृष्ण !इक तेरे बिन ।।

04/01/2017

" गये बचपन से उनको आज देखे "

चलो अब हुश्न का महताब देखें
अधूरे ही सही पर ख्वाब देखें

बड़ी कमसिन अदाएँ वो दिखाई
मेरा निखरा हुआ अन्दाज़ देखें

गये दिन बीत उस आवारगी के
मनाएँ जश्न इक आगाज़ देखें

अभी जिंदादिली है खूब उनमें
मुकद्दर जोड़कर एहसास देखें

बड़ी ही खूबसूरत सी गज़ल हैं
सजा लूँ लब पे फिर आवाज देखें

जरा सा हाँथ पकड़े चल पड़े बस
संवरते भाव के अल्फाज़ देखें

फ़तह फर्माइसों की कर लिए हैं
समूचेपन का ये विश्वास देखें

मुकर्रर जिन्दगी आखिर कहाँ है
भरे मन से उन्हें हम आज़ देखे

यहाँ अट्टालिका पे साथ हैं हम
हमारे प्यार को आकाश देखे

कई दिन, दोपहर हैं साल बीते
गये बचपन से उनको आज देखे 

03/01/2017

यह धरा पूरी तुम्हारी इस धरा को जीत लो

है यहाँ रहना तुम्हें तो गीत गाना सीख लो
ढाई आखर शब्द बोलो मुस्कुराना सीख लो

मैं नही कहता कि तुम परतंत्र हो निष्पन्द हो
किस कदर चलना तुम्हें जम्हूरियत से सीख लो

वो यहाँ जिस राह भेजें शान्त हो यूँ चल पड़ो
हाँथ में लेलो कटोरा और उनसे भीख लो

चल रहे हँथियार हों तो कष्ट तुम सहते रहो
जिन्दगी भर जख़्म खाओ दर्द हो जब चीख लो

चमड़ियाँ पहले भी उधड़ी आज भी आलम वही
थूँकने की चाह जब हो हाँथ में ही पीक लो

ख़त्म कर दे रूढ़ियाँ सब इस भरे संसार से
बुद्धि का कौशल दिखाओ साथ सारे मीत लो

और अब इंसानियत की है कहाँ कद्र-ए-हुज़ूर
बेड़ियाँ सब त्यागकर अब सर उठाना सीख लो

यह प्रकृति,यह भोग,वैभव शान्त यह वातावरण
यह धरा पूरी तुम्हारी इस धरा को जीत लो 

02/01/2017

राजसिंहासन पे अब मजदूर होने चाहिए

जिन्दगी के जख़्म सारे दूर होने चाहिए
जो इरादे नेक हों मंज़ूर होने चाहिए

राजधानी देश की रखे रहो दिल्ली मगर,
राजसिंहासन पे अब मजदूर होने चाहिए

कब तलक आखिर रखेंगें इस कदर इज्ज़ो -नियाज़
जुल्मियत की त्याग पे मज़कूर होने चाहिए

राष्ट्र यह उन्नति करे , हो राष्ट्र जन्नत की तरह
इस सियासत में सभी अब शूर होने चाहिए 

01/01/2017

गुब्बारे वाली बच्चियाँ

गुब्बारे वाली बच्चियाँ,
रोज़ दीखती हैं।
दिन - रात
विश्वविद्यालय के बाहर
लंका चौराहे पर ,
अपने भविष्य का निर्माण करती हुई ।

रोज़ दीखते हैं
उनके पवित्र हाँथों में गुब्बारे,
जो शायद अपना अस्तित्व स्थापित कर चुके हैं
उनके पवित्र हाँथों में ।
जिनमें अभी भी कई सम्भावनाएँ बची हुई हैं ।

रोज़ दीखते हैं बच्चे कचरा
बीनने वाले,
हर रोज़ हाँथ - फैलाते हुए बच्चे
दीख जाते हैं सड़कों पर
दीखते हैं होटल ,रेस्ट्राँ में
काम करते हुए बच्चे
उसी विश्वविद्यालय के बाहर जहाँ
लगभग 50 हजार
विद्यार्थियों का भविष्य रचा जा रहा है
रचे जा रहे हैं ,
डाक्टर ,मास्टर ,इंजीनियर
रचे जा रहे हैं ,
गायक ,वादक ,नर्तक
रचे जा रहे हैं कवि ,रचे जा रहे हैं
आलोचक,
रची जा रही हैं ढेरो सारी कलाएँ
संस्कृति और सभ्यताएँ
रची जा रही है पूरी की पूरी एक पीढ़ी भावी भविष्य की ।

उन हाँथों को अभी भी ,
पकड़ाया जा सकता है
काॅपी कलम और पुस्तकें ,
पकड़ाई जा सकती है एक राह
जो उनकी सुनहली मन्जिल तक जाए ।

बचे हुए हैं दिन ,महीने ,साल
बची है उनकी पूरी जिन्दगी
बचे होंगे सपने
जो वो हर रोज़ देखती होंगी ,
किसी बच्चे को बैग टाँगे देख
बचा होगा एक सुनहला भविष्य
जिसका निर्माण होना अभी बाकी है
अभी बाकी है रात की काली स्याह चादर का हटना ,
एक सुनहली सुबह के लिए ।

मालवीय जी ,
हर दिन - हर रात ,
रक्त होते होंगे लज्जा से
इन बच्चियों के हाँथों में गुब्बारे देखकर ।
शर्मिन्दगी से हर रोज़ अपना चेहरा
छुपाते होंगे ,
इन बच्चों के सामने ।।


*Girls with Balloons*

Girls selling Balloons
are seen everyday
Day and night
In front of University
on Lanka square
shaping their future.

Everyday balloons can be seen
in girls sacred hands;
which perhaps have established
their existance
in those sacred hands,
in which lots of possibilities still there.

Everyday children are seen
picking rags,
children on roads can be seen
extending their palms for begging
chlid workers are seen
in hotels, restaurants;
outside same university
where future of about 50 thousands students is being shaped,
Doctors, Professors, Engineers are being created
Singers, Players, Dancers are being created,
Being created there are poets, critics, lot of arts,
culture and civilizations,
A whole new generation of future is being created there.

worksheets, pen and books
can be given to those hands
and a path could be shown to them
which can lead them to bright future.

Days, months, years are still remaining
remaining is their whole life,
perhaps remaining would be their dreams,
which they would be having on seeing any child carrying school bag,
left would be a bright future
which is yet to be shaped.
It is yet left for dark black sheet of night to be uncovered for a golden bright morning.

Malviya ji,
would be of red faced, embarrassed
to see balloons in the hands of those girls
He would be hiding his face in shame
in front of these children.

Written By Neelendra Shukla " Neel "
Translated By Priyesh Shukla

नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ इन बच्चों के साथ आप सभी को ।।


26/12/2016

नववर्ष ( गीत )

नवजीवन हो नये वर्ष में
भरे सदा उजियारा ।
रहे सदा उत्तुड़्ग श्रृड़्ग
पर भारतवर्ष हमारा ।।

संस्कृति ,संस्कृत
सत्य,सनातन
की ज्योति
जल जाए,
खग ,विहंग उल्लसित
व्योम में ,
नदियाँ गीत सुनाएँ
ऐसा हो सद्भाव
जगत में,
सब में भाईचारा ।

इक माँ का
आँचल पकड़ें
छूटे भी गिर
न पाएँ,
दूजी माँ है
गोद पसारे
निडर गिरें
उठ जाएँ
धन्य हुआ ऐसी
माँ पाकर,
जीवन धन्य हमारा ।

गंगा,यमुना
हिमगिरि,पर्वत
को सब मिलें
बचाएँ,
मानवता लाएँ
जीवन में
हम मानव बन जाएँ
पशु,पक्षी की
रक्षा कर ,
हम उनका बनें सहारा ।

गीत बनाएँ,मीत बनाएँ
प्रीति बढ़ाते
जाएँ,
धरती से आकाश
तलक,यह
रीति बढ़ाते जाएँ,
ऐसा सुन्दर
काम करें
चमके यह चाँद ,सितारा ।।

उज्वल हो भविष्य
नित सुन्दर
कलियाँ खिलती जाएँ,
मधुर,मनोहर
राष्ट्र देखकर
देव वहाँ मुस्काएँ
ऐसा राष्ट्र चमत्कृत
हो,
हो देवलोक से प्यारा ।।

नवजीवन हो नये वर्ष में
भरे सदा उजियारा ।
रहे सदा उत्तुड़्ग श्रृड़्ग
पर भारतवर्ष हमारा ।।


21/12/2016

स्त्रियों !

स्त्रियों,
क्या चाहती हो ?
हमेशा की तरह अब भी
पुरुषों के तलवों तले रहना
उनके हाँ में हाँ मिलाना
या खुद को अधिकृत समझ ली हो उनका ।

जो द्वापर से लेकर आज तक
फाड़ते आ रहे हैं तुम्हारे चीर
और लगातार फाड़ते जा रहे हैं
निडर और निर्भीक,
क्या तुम्हारी चुप्पी कभी नही टूटने वाली ।

क्या तुम्हारा सिर्फ़ इसलिए जन्म हुआ है
कि सज , सँवर सको
लाली , लिप्स्टिक और काजल जैसे
तमाम तरह के पदार्थों से
सुन्दर दिख सको
या तुमने समझ लिया है
कि नही है तुम्हारा कोई अस्तित्व
इस समाज के भीतर
मात्र बच्चा पैदा करने की मशीन बनने के सिवा ।

क्या यह अधकचरा
डर भरा जीवन
तुम्हें सुख देता है ।
यदि नही तो आवाज ही नही
साथ ही उठाओ तलवार भी
और उतार दो उनको मौत के घाट
जो तुम्हारी अस्मिता को आँच दें,
उतारें तुम्हारी इज्जत सरेबाजार ।

मत रखो अपेक्षा मुझ जैसे
कायरों से,
मानसिकता के साथ - साथ
मजबूत करो अपनी देह भी
नही तो भकोस जाएँगें
तुम्हारा पूरा का पूरा समाज
जैसे
काटते हैं कसाई बेतरतीब सीधी गायों को ।।

17/12/2016

फल

खा लिया है सूखी रोटियाँ
नमक और मिर्च की चटनी के साथ
चल दिया है अपने खेतों की ओर
दाएँ कंधे पर फावड़ा और
बाएँ पर रख एक मटमैला गमछा
गाए जा रहा है,
उठ जाग मुसाफिर भोर भई
अब रैन कहाँ जो सोवत है ।।

बारहों मास बिन थकान
सुबह,दोपहर,शाम
करता रहता है काम ।

डटकर  लड़ता है गर्मियों की
लू से और सर्दियों के थपेड़ो से
कभी सूखा तो कभी
मूसलधार बारिश जैसे
दैवीय प्रकोप भी सहना पड़ता है उसे ।।

तनिक भी नही अखरता उसे
खेतों में काम करना ,
अपने पसीने से सींचते हैं खेत
जैसे एक माँ सींचती है स्तनों से
अपने बच्चों का पेट ।।

भरसक करते हैं मेहनत,
खेत को उर्वरा बनाने के लिए
बीज बोने के लिए
फसल की अच्छी पैदावार के लिए ...

कर्म करते - करते निकल जाते हैं
सालो साल
खोलते ही आँख गर्त में दिखता
वर्तमान काल ।।

सूख गए हैं आँसू आँखों में ही
उधड़ गई हैं चमड़ियाँ काम करते - करते
झुक गए हैं कंधे दुनिया के बोझ से
गरबीली गरीबी से आँखों में भरा डर
रस्सी से लटका देता है उनका सर
और यही फल है इन शासनों में
रस्सी से लटकता हुआ किसान .........

12/12/2016

आसान ये कहाँ है ( गज़ल )

तुम मुझको भुला पाओ ,
आसान ये कहाँ है
मैं तुम तक पहुँच पाऊँ
आसान ये कहाँ है

हसरत भरा हृदय है
खामोशियाँ हैं , लब पे
चिलमन से झाँकना यूँ
आसान ये कहाँ है

रातें ये शबनमी हैं
दिन भी है सूफियाना
पर दोपहर में तपना
आसान ये कहाँ है

चेहरे पे लट बिछाकर
सोई थी छाँव में तुम
हाँथों से लट हटाना
आसान ये कहाँ है

रंगीन है हँथेली
मेंहदी की खुशबुओं से
चेहरे का नूर होना
आसान ये कहाँ है

होंठो पे सुरमयी से
जो बाँध आ बँधे हैं
उनको यूँ गुनगुनाना
आसान ये कहाँ है

भटका हूँ राह में पर
फिर मैं सम्हल गया हूँ
तुमको ही भूल पाना
आसान ये कहाँ है

तुम मुझको भुला पाओ
आसान ये कहाँ है
मैं तुम तक पहुँच पाऊँ
आसान ये कहाँ है
आसान ये कहाँ है
आसान ये .....है 

30/11/2016

अच्छे दिन

सुनिए ,
अच्छे दिन आ गये हैं
पर किसी से कुछ कहियेगा नही

सैनिक घटते जा रहे हैं
सरहदों से
जैसे खेतों से घटती जा
रही है उपज अनाज की ।।

सड़कें उखड़ती जा रही हैं
हो चुका है यातायात अवरुद्ध
बनारस की चौड़ी और
फोर लेन्थ की सड़कों पर भी ।।

आठ - दश साल के बच्चे
भूँज रहे हैं भूँजा लगातार
भूँजे के साथ अपना पूरा बचपन
आग की धधकती आँच में ।।

कुछ दौड़ रहे हैं
घाट की ऊँची - नीची सीढ़ियों पर बेहिचक
चाय की केतली हाँथों में लेकर
वहीं
कुछ चार - पाँच साल की लड़कियाँ
दिखा रही हैं करतब
पूरी धरती को अपने में समेटती हुई ,
बजा रही हैं ढोल
गाए जा रही हैं भोजपुरी के
अश्लील गाने घाटों पर
पेट के लिए ,
दो वक्त की रोटी के लिए ।।

आत्महत्या करते जा रहे हैं
किसान ,
दिन पर दिन बढ़ती जा रही है इनकी संख्या
मगर ये आत्महत्या नही
हत्याएँ हैं,
और हत्यारे घूम रहे हैं सरेबाजार
किसानों के हित की तोंदियल
बातें बतियाते हुए
निर्द्वन्द और निर्भीक ।।

भिखारी दर - दर खड़े हैं
हाँथ में कटोरा लेकर
कम से कम
एक रुपये की माँग के साथ ।।

गंगा की उफनाती लहरें
आती हैं पूरे वेग से
पैर से टकरा कर हो जाती हैं
शान्त
प्रकट करती हैं विरोध
मुझे अपना मान ,
गंगा अभियान वाले मुँहबोलों के खिलाफ ।।

नही बदला है कुछ भी ,
वही है दिन , वही रात
गद्दी वही है
वही है राज्य
जनता भी वही भोली - भाली
बस बदले हैं तरीके
बदले हैं राजघराने के लोग
और बदल गये हैं राजा
जिनके अच्छे दिन चल रहे हैं ।।


The poem has been selected in
magazine of kaksaad ..
Thank you sir,
Thank you my friend's..


सृष्टि का निर्माण कर दूँगा प्रिये ! वादा मेरा है

सृष्टि का निर्माण कर दूँगा प्रिये !वादा मेरा है ।
तुम नही रोओ कि रोएगा जहाँ वादा मेरा है ।।

अब हवाएँ मुक्त होंगी सृष्टि के उल्लास में 
साथ तुम मेरे रहोगी माह उस मधुमास में 
चाहता हूँ साथ मैं अपने हृदय की संगिनी का 
जिस तरह से साथ है अम्बुधि का अमरतरंगिनी का 
आज कैसे छोड़ दूँ ऐसे गलीचों में तुम्हें 
फिर मिलेंगे दिव्य इन्दीवर बगीचों में तुम्हें ।

व्योम से निर्झर गिरेंगी बूँद ये वादा मेरा है ।।

आज होंठों को सजाकर इस हृदय से दूर हो 
या कि कोई है समस्या आज क्यों ? मजबूर हो 
तुम चलो तुमको दिखाऊँ चन्द्रमा उस छोर में
शीत रश्मि गिर रही है उस दिशा, उस ओर में
यूँ फँसे हैं आज कम्पित हो रहा है मन मेरा 
यूँ हुई बारिश शहर ,घर भीगता आँगन मेरा ।

साथ दूँगा मैं सदा मजधार में वादा मेरा है ।।

है तमन्ना कुछ नही अब ये जगत मैं छोड़ दूँ 
मैं रहूँ इक तुम रहो बस जिन्दगी को मोड़ दूँ
आँख का आँसू बनूँ मैं इस कदर उलझा रहूँ 
तू नजर के सामने रह मैं सदा सुलझा रहूँ
जिन्दगी वीराँ नही हो एक - दूजे के लिये
दिन,महीने,साल हों आशिक मरीजे के लिये ।

डूब जाऊँगा तुम्हारे प्यार में वादा मेरा है ।।

मैं सदा सोऊँ तुम्हारी जुल्फ की छैयाँ तले
आज आ जाओ यहाँ सब छोड़ लग जाओ गले
जिन्दगी ये है समर्पित तुम कहो क्या कह रही
यह मिलन की वार्ता सुन मन्द वायु बह रही
फिर कहो मेरी प्रिये किस बात की अब देर है
सत्य कहता हूँ प्रिये ! ये न गज़ल, न शेर है ।

दो हृदय का मेल हो जाएगा ये वादा मेरा है ।।

काव्य के झंकृत स्वरों को मान दे दूँ  मैं अभी
दिव्य उर की कल्पना सम्मान दे दूँ मैं अभी
हाँथ जो इक बार पकड़े फिर नही छोड़ेगें हम 
साथ कदमों से तुम्हारे मिल चलेंगें ये कदम 
मैं नही इन वर्जनाओं को करूँ स्वीकार अब
हाँथ यूँ पकड़ो मेरा मैं त्याग दूँ संसार सब ।

जिन्दगी भर साथ न छोडूँगा ये वादा मेरा है ।।


27/11/2016

आपदा और किसान

आपदाएँ ,
मार देती हैं किसानों को
ख़त्म कर देती हैं उनकी जिन्दगी
बरबाद कर देती हैं सारी फसल ।
किसानों के दारुण हृदय की दर्द भरी
आवाज़
हृदय को झकझोर देने वाली ,
आह....
इस ध्वनि से अथवा
किसी भयानक - बवंडर के आ जाने के
बाद का वह भयावह दृश्य,
जो एक किसान को उसके माथे पे हाँथ रखने पर
मजबूर कर देता है,
और नैसर्गिकतया, न चाहते हुए भी
मुख से हाय यह शब्द निकल जाता है ।

टूट जाता है,
सारे सपनों को टूटते हुए देख
बच्चे की फीस ,अम्मा और बाबू जी के लिए दवाइयाँ
अगले माह बिटिया की सगाई
उसके लिए जेवर थोड़े बहुत
दहेज में गाड़ी,
उसके साथ पचास हजार नगद जैसे कई
जरूरी सपने
पर वह हार नही मानता
फिर से किसी के ढ़ाढस बंधाने पर खुद को मजबूत
करते हुए,
अपनी दूसरी फसल के बारे में सोंचने लगता है
किसान,
जैसे प्रथम पुत्र के मरणोपरांत दूसरे पुत्र के
बारे में सोंचते हैं लोग
और प्रवृत्त हो जाता है दूसरी फसल की
जुताई ,बुआई ,रोपाई में
पुनः लहलहाती फसलें खेतों में लहराने लगती हैं
किसान के चेहरे की वह प्रसन्नता जो
शदियों से खोई थी ,
आज देखने को मिली उसके चेहरे पर  ।
अब वह नही चाहता इनसे दूर जाना
तनिक देर भी,
लगा रहता है निराई , गोड़ाई में ,
स्पर्श करता है जब उन फसलों की
बालियों को ,
लगता है पुचकार रहा हो अपने 2 साल के
पोते को जिससे निकलने लगी है
तुतलाहट भरी आवाज़ ,
कुछ ही दिनों के भीतर भर देता है
सारा कर्ज ,
लोग कहते हैं वो देखो जा रहा है किसान
जो कभी सदमे में था ।।

22/11/2016

खाये जा रहे हैं

खाये जा रहे हैं ,
जैसे खाते हैं लकड़ियों को घुन
वैसे ही खाये जा रहे हैं
किसानों के खेत ,
बिके जा रहे हैं
अनाज सेंत ,
अभी और न जाने क्या क्या
खायेंगे,
खाये जा रहे हैं ,
बाग़ बगीचे फूल और फल
चबाये जा रहे हैं
हरी भरी पत्तियाँ ,
धीरे धीरे बढ़ रही है
गति,
खाने की

जब से बेंच दिये हैं
अपना वजूद ,
भूल गये हैं अपनी अहमियत
एकाएक ,
यह बदलाव
कहीं खा न जाए
गाँव ,घर
पूरा का पूरा
शहर

कहीं बेंचनी न पड़ जाये
या बेंच दें आबरू
बहन और बेटियों की
कहीं नीलाम न कर दें
माँ की इज्जत
खाने ख़ातिर

कहीं साजिस न
रची जा रही हो
हमारे प्रदेश ,देश
और
समूचे राष्ट्र को
खाने की।।

उजड़ा घर

जितना उड़ पाओ उड़ लो तुम
दो पल के जगजीवन में
औंधे मुँह गिर जाओगे
फिर उसी किसानी भोजन में

गहन अँधेरे में आँखें
आखिर कैसे खुल पाएँगी
सपने जैसे टूटेंगे
फिर रोएँगी ,चिल्लाएंगी

बाजारों से भोजन लाओ
घर में न इक दाना है
पानी लाने अम्मा के संग
बहुत दूर तक जाना है

बहन हमारी छोटी सी
क्यों ? रोती है,चिल्लाती है
मुँह में मिट्टी डाल ,उसे
क्यों ?कूँच कूँच के खाती है

पिता गए बाजार वहाँ से
कुछ तो वो लाते होंगे
रो मत बहना !धीरज रख
अब साँझ हुई आते होंगे

जब तक लाते बाजारों से
चक्कर आया गिरी उधर
मेरी प्यारी भोली बहना
गई हाँथ में मेरे मर

पिता देख तड़पा ,चिल्लाया
बोला बेटी खाले तू
उठ उठ बैठ मेरी बिटिया
थोड़ा सा भोजन पाले तू

नहीं किया भोजन भाई भी
सारा दिन वह रहा उदास
सर्दी ,सर्द हवा से वह,सब
छोड़ चला बहना के पास

कैसे दिल आशीष तुम्हें दे
बच्चों के हत्यारे तुम
मेरे बेटे कहाँ गये
जीवन के चाँद सितारे तुम

माता-पिता अधीर हुए
दोनों नें आज लिया सल्फ़ास
आज गरीबी नें कर दी है
चार चार लोगों को लाश

हाँथ जोड़कर प्यारी बातें
घर घर वो बतियाते हैं
'मेक इंडिया' कहने वाले
कब तबके में आते हैं

14/11/2016

चलती लाश

मरे आदमी औरत टूटी
बुझता गया उजास
रोज़ मुझे दिख जाती है
सड़कों पे चलती लाश

काट दिये हैं सारे उपवन
तड़प रहा हूँ मैं ,मेरा मन
बिलकुल सूनसान ,निर्जन वह
खाली पड़ा अकाश

जला नहीं अब तक घर चूल्हा
टूट गया है चल चल कूल्हा
रहे बांटते बिजली, पानी
फिर भी बुझी न प्यास

बच्चे ऐसा सिला दिये हैं
मिट्टी में सब मिला दिये हैं
रहें ख़ुशी से हरदम प्यारे
वो करती उपवास

आज लगा कि स्थिर हूँ मैं
आँख में उनके गहन तिमिर मैं
बच्चों के सुख की ख़ातिर ,
अब ले लूँ मैं सन्यास

लूला लंगड़ा काना है वो
बच्चा नहीं सयाना है वो
उससे दुर्व्यवहार करें
करते उसका उपहास

पेट पीठ पाषाण हुये हैं
कोई लघु परिमाण हुये हैं
हैं  अनाज न खेत में
चक्की रही उदास

तरुणाई भी न आ पाई
दर्द बहुत लोगों से पाई
मेरी मुनिया मर गई
तड़प तड़प कर आज

मस्त रहा है वो अपने में
बिखरे कुछ टूटे सपने में
''नील'' धरा का बैरागी है
रही न कोई आश   

08/11/2016

सफ़र में जिन्दगी नीलाम कर दी

सुबह ख़्वाबों में आई शाम कर दी
भरी महफ़िल में उसने जाम भर दी

मरे अब तक नहीं हम रोज़ मरकर
सफ़र में जिन्दगी नीलाम कर दी

बड़ी शिद्दत से जिसको चाहता था
उसी नें आशिकी बदनाम कर दी

नशा अब तक चढ़ा है यूँ मेरे सर
मुझे यह बेरुख़ी वीरान कर दी

बड़ी हसरत भरी थी इस हृदय में
मुझे इक पल में वो अन्जान कर दी

अहिंसा के पुजारी बन गये हैं
कि जब से वो हृदय शमशान कर दी

कि अब ये दूरियाँ मिट पाएँ कैसे
बना दुश्मन वो पाकिस्तान कर दी

अधूरी जिन्दगी मैं ढूढता हूँ
कहाँ ये जिन्दगी कुर्बान कर दी 

बुरा लगता है

बुरा लगता है,
जब कोई कोशिश करे उतारने की
चेहरे पर लगे हुए मुखौटे को
तब बुरा लगता है।
फिर चाहे हों मित्र ,बन्धु
पिता माता या हो कोई और।

और बहुत बुरा लगता है तब
जब कोई कमेंट्स करे अपनी बहन पे ,
देखकर बजाये सीटियाँ या
खींच लिया हो दुपट्टा ,
फाड़ दिए हों कपड़े सरेराह
मन होता उतार दूँ पूरा का पूरा
ख़न्जर उसके हृदय में ,
तोड़ दूँ बत्तीसों दाँत या
तोड़ कर हाँथ - पैर बैठा दूँ साले को
अधमरा कर दूँ ,
ताकि दुबारा वह किसी से बोलने में भी
काँप उठे।
पर बुरा नहीं लगता तब जब हम स्वयं किसी की
बहन बेटी या बहू पे डाल रहे होते हैं डोरे
या पास कर रहे होते हैं ढ़ेर सारे भद्दे कमेंट्स

बुरा लगता है ,
जब मजाक ही सही कोई प्रयोग करे प्रेमिका
के लिए वो शब्द ,
जो वह स्वयं प्रयोग करता हो
किसी दूसरे की प्रेमिकाओं के लिए
मॉल और भौजी जैसे शब्द ,
जब उन्ही का प्रयोग होने लगे स्वयं पर
तब बुरा लगता है।

और बुरा लगता है तब ,
जब यथार्थ के धरातल पर लाकर पटक दे कोई ,
दिखा दे तुम्हारी नग्नता भरी तस्वीर ,
तुम्हारे एकटक देखते रहने का कोई कर
दे विरोध या
दे दे गालियाँ ,
लगे तुम्हारी धज्जियाँ उड़ाने तुम्हारे ही
किये गए कारनामों पर ,
बात - बात में तुम्हें दिखाने लगे नीचा
और ,
अपना होकर जब कोई अपनेपन का अहसास
न होने दे तब ,
उसे ही नही मुझे भी
बुरा लगता है।।

नक्कटी जनता और हम

 जितनी नक्कटी है ये जनता
 उतने ही नक्कटे हैं हम।
 जो पहुँच जाते हैं ,
हर साल छह महीने के भीतर ही
कइयों मंच पर
जहाँ से देते हैं कइयों मौलिक विचार ।

समझाते हैं देश - दुनिया की बातें
खोलते हैं पोल नेता की
मंत्री की,
और इस बेलगाम कानून की ,
ले आते हैं सामने समाज में छिपी हुई
बुराइयों को,
करते हैं जनता के हित की बातें ।

मगर हमारी जनता ,
हमारे ही विचारों की अर्थियाँ उठाने में
अपना वक़्त ज़ाया नही करती।
वो बस पीट देती है तालियाँ
और अगर
कहीं कविता हो प्रेम पे तब देखो
इन तमाशबीनों की बजती हुई सीटियाँ ।

छेड़ दो दो - चार शेर
सुनते रहो अपने जुमलों पर जनता की वाहवाही।
क्योंकि आज की जनता को विचार नहीं
आनन्द चाहिए।
जिसके लिए हमें खरीदा जाता है चंद पैसों में ।

चंद पैसों के लालच और अपनी
शानो - शौकत के
लिए बिक जाते हैं हम।।

24/10/2016

आतंकवादी

बहुत ही बेख़ौफ़ आँखें थी उसकी
जिसमें कभी ख़ौफ़ भरा था
बड़ी कातरता से देखती थी
बचपन में ,
दूसरे के हाँथो की रोटियाँ।
आग की लपट आती है
अब ,
उन्हीं आँखों से
जैसे ,सबकुछ जलाकर राख़ कर देंगी
वे आँखें,
जिनमें मुझे दिख रहा था
बारूद ,गोले और ज़लज़लों का
सैलाब।
कई यातनायें सह चुकी थी उसकी शरीर
बहुत सारे कष्ट उठा चुकी थी।

शायद ,
नहीं मिला हो उसे
माँ और बाबू जी का प्यार
किसी नें बचपन में ही पकड़ा दिया हो हथियार
सिखाया गया हो उन्हें शुरू से ही
मार - काट। 
भर दिया गया हो उसका दिमाग़
अनाप सनाप के सवालों से
बना दिया गया हो
उन्हें देश का दुश्मन
कइयों लालच दे देकर
जोड़ दी गई हों कई पाक़ चीज़ें ,
उन नापाक कार्यों में
जिसमें ईश्वर,अल्लाह जन्नत और नर्क
जैसी लुभावनी बातें हों।
जोड़ दी गई होंगी बातें हिन्दू और मुस्लिम वाद की
विरोध की ,
प्रतिशोध की ,
भरे गये होंगे कान एक - दूसरे के प्रति
तबाही के प्रति , उसकी बर्बादी के प्रति ,

उनके आकाओं नें
नही सिखाया होगा उन्हें साम्यवाद का ज्ञान ,
नही पढ़ाई होगी उन्हें गीता ,
नही पढ़ाया गया होगा उन्हें कुरान।
पकड़ा दिये होंगे उन्हें
A.K 47 जैसा रिवाल्वर
भरी होंगी गोलियाँ
बम बारूदों कट्टों और मशीनगनों से शांति फैला देते हैं पूरे शहर में।
बर्बाद हो जाता है पूरा का पूरा शहर
तबाह हो जाता है पूरा मंज़र
तड़तड़ाती निकलती हैं गोलियाँ
सीनों को भेदने के लिये ,
उन्हीं गरीब ,सताये ,तड़पाये और
पीड़ितों की बन्दूकों से।
जिनकी बचपन में छिन जाती है आज़ादी ,
उन्हें ही बाद में हम कहते हैं आतंकवादी।।

रामराज कै रहा तिरस्कृत रावणराज भले है!

देसभक्त कै चोला पहिने विसधर नाग पले है रामराज कै रहा तिरस्कृत रावणराज भले है ।। मोदी - मोदी करें जनमभर कुछू नहीं कै पाइन बाति - बाति...